Wednesday, 28 October 2015

आयुर्वेद मे नो साईड इफेक्ट … ???

आयुर्वेद मे नो साईड इफेक्ट ???


             आजकल चारो तरफ आयुर्वेद का बहुत ही प्रचार  प्रसार हो रहा है चारो तरफ आयुर्वेद चिकित्सा की ही बाते हो रही है कुछ बाबाओ ने भी आयुर्वेद को घर घर पहुचाया है, लोग बिना किसी चिकित्सक की सलाह के भी आयुर्वेद दवाओ का सेवन धडल्ले से कर रहे है ,लोगो की एक धारणा बनी हुई है कि “आयुर्वेद मे नो साईड इफेक्ट”

              हम सब जानते है कि हम जो भी आहार शरीर मे लेते है वह निश्चित समय पर अपना असर दिखाना शुरू कर देता है , अच्छा असर होगा तो हमारी हेल्थ अच्छी होगी और यदि असर खराब होगा तो हेल्थ खराब होगी, किसी वस्तु को खाने से हम कई बार बहुत  परेशान हो जाते है और उसी  वस्तु को खाने से हमे कई बार आनंद की अनुभुति होती है,एक कहावतहै “ किसी को बैंगन वायरे (वायु कारक) किसी को बैंगन पछ ( पथ्य)”  यह सब हमारी पाचन क्रिया का  कमाल है या फिर भोजन का ही अलग अलग असर है हम कुछ समझ नही पाते है, इसके लिये आयुर्वेद मे बहुत ही सही तरिके से समझाया गया है,अलग अलग प्रकृति के लोग होते है उन्हेअलग तरीके का भोजन लेना चाहिये अपनी प्रकृतिके अनुकूल भोजन हमे सही रहता है उसी प्रकार यदि हम आहार को गलत मिश्रण से लेंगे तो वह आहार हमारे शरीर पर गलत असर कारक होगा जैसे लह्शुन और दूध एक साथ सही नही रहता, खीर और दही विषम भोजन है इस प्रकार के कई उदारण है,

                इसी प्रकार आयुर्वेद के ग्रंथो मे सभी मनुष्यो की प्रकृति के अनुसार दवाओ का वर्णन किया गया है  जिस प्रकार प्रकृति के विपरीत भोजन करने से वह गलत इफेक्ट दिखाता है तो फिर आयुर्वेद की दवा  गलत असर क्यो नही दिखा सकती, इसलिये हमे अपने चिकित्सक के परामर्श के बिना कोई भी दवा नही लेनी चाहिये यदि बिना किसी परामर्श के दवा लेंगे तो वह दवा चाहे आयुर्वेदिक ही क्यो ना हो गलत तरीके से ले तो वह साईड इफेक्ट कर सकती है, जैसे एक दवा है इसबगोल – इस दवा को यदि गरम पानी से ले तो कब्ज को दुर करती है और यदि यही दवा यदि ठंडे पानी से ले तो दस्त को रोकती है, अब यदि कोई दस्त का मरीज इस दवा को गरम पानी से ले ले तो उसके दस्त खुनी दस्त मे परिवर्तित होने मे कितना समय लगेगा,

                आयुर्वेद मे बहुत सी औषधि है जो विषो से बनाई जाती है बुखार की दवा संजीवनी बटी मे ही दो विष है एक भिलावा और दुसरा वत्सनाभ, अब यदि कोई भी आम आदमी इस दवा को बिना किसी चिकित्सक की सलाह के सेवन करेगा तो खतरा पैदा हो सकता है, इसी प्रकार विषो से बनी सैकडो दवाये है जो बाजार मे भी आराम से मिल जाती है बिना किसी चिकित्सकीय परामर्श के ,यध्यपि यह सब दवा पुर्ण शास्त्रोक्त तरीके से विषोको शुद्ध करके बनाई जाती है लेकिन फिर भी यदि कोई  मरीज अपने आप ही, या किसी बाबा के कहने पर या कोई भी नीमहकीम के कहने पर दवा ले लेगा तो साईड इफेक्ट होने की सम्भावना हो सकती है क्योकि वह उस दवा की प्रकृति तथा मरीज की प्रकृति के बारेज्यादा नही जान पायेगा, कहते है ना अधुरा ज्ञान खतरनाक होता है ,कई लोग तो इतने मूढ  होते है कि अखबार मे पढ लिया या किसी मेग्जीन मे देख लिया और दवा लेना शुरू कर देते है, क्योकि उनकी सोच है “आयुर्वेद नो साईड इफेक्ट” 

                 उनकी सोच सही हो सकती है आयुर्वेद मे साईड इफेक्ट नही होता होगा लेकिन आयुर्वेदिक दवाये किस प्रकार से किस द्रव्य से बनती है यह जानने वाला ही बता सकताहै कि किस रोग मे यह दवा असर कारक है और किस रोग मे नुकसान दायक आयुर्वेद की दवाओ मे  धातुओ  का प्रयोग किया जाता है जैसे--पारा, शीशा,हीरा,माणिक्य,सोना,चांदी, ताम्बा, लोहा, आदि, ये सभी शरीर के लिये घातक है लेकिन आयुर्वेद के मनिषियो ने इन्हे शुद्ध करने के तरीके बताये है इन धातुओ को शुद्ध करके ही प्रयोग मे लिया जाता है यह सब कौन जानता है ?  यह सब बाते आयुर्वेद के ज्ञाता विद्धवान चिकितसक ही  सब जान सकते है और वे ही बता सकते है कि कौन सी दवा  कब,किस समय, किस रोगी को,  किस बिमारी मे देना चाहिये, इन दवाओ को यदि बिना किसी चिकित्सक के परामर्ष के कोई लेता है तो वह अपने लिये खतरा मोल लेता है


                    कई  आयुर्वेदिक दवा नाम से समान लगती है लेकिन काम बिल्कुल ही अलग होता है जैसे – खदिरादि बटी  गले के लिये काम आती है जबकि खदिरारिष्ट चर्मरोग मे काम  आती है , इस लिये हम सभी को यह बात पता होनी चाहिये कि ऐसी  बहुत सारी बाते है जो हमे खतरे मे डाल सकती है अतः यह धारणा मन से निकाल देनी चाहिये कि आयुर्वेदिक दवा से कोई नुकसान  नही होगा या कोई साईड इफेक्ट नही होगा, इति..

Friday, 25 September 2015

शरीर को संतुलित करता है “ उत्कटासन”

शरीर को संतुलित करता है “ उत्कटासन”

परिचय-

आज जिस आसन की बात करने जा रहा हुँ वह है “उत्कुटासन”  इस आसन को करने से शरीर का संतुलन सही हो जाता है शरीर जब असंतुलित हो जाता है तब बैठे बैठे ही लुढक जाते है तो यह आसन करने से शरीर का संतुलन बन जाता है

विधि—

चित्र अनुसार मुद्रा मे पैर के पंजो के बल बैठकर , सीना सामने निकला हुआ , हाथ पंजे के समीप भुमि छुते हुये, हाथ सीधे या नमस्कार की मुद्रा मे रखे , श्वास की गति सामान्य रखे


चित्र देखे –




लाभ –

 इस आसन को करने से पिंडली मजबूत बनती है , शरीर संतुलित होता है 

Saturday, 19 September 2015

“साईटिका” रोग को ठीक करता है - शशकासन

“साईटिका”  रोग को ठीक करता है -  शशकासन


आज हम एक आसन की बात करेंगे जिसे  शशकासन कहते है , यह आसन खरगोस के बैठने के समान दिखाई देता है और संस्कृत मे खरगोस को शशक कहते है अतः शशक समान स्थिती मे बैठने को शशकासन कहते है यह आसन पेट सम्बंधितकई रोगो मे कारगर है लेकिन सायटिका रोग मे इस आसन को करने से सायटिका रोग मे आराम मिलता है


 हमारे दोनो पैरो मे एक नस होती है जिसे साईटिका कहते है और आयुर्वेद मे इसी नस को गृधर्सी  कहते है इस नस मे कई बार बहुत ही तेज दर्द होने लगता है यह पुरी नस कुल्हे से लेकर एडी तक बहुत दर्द करती है  इस रोग को साईटिका रोग कहते है इस रोग को ठीक करने मे शशकासन  बहुत ही कारगर है


विधि – 

वज्रासन( दोनो पैरौ को मोड कर कुल्हे के नीचे दबा कर बैठे)  मे बैठकर , श्वास को छोडते हुये कमर से उपर के भाग आगे ( कमर , रीढ , हाथ एक साथ) झुका कर मस्तक धरती से लगाये, दोनो हाथ जितना आगे ले जा सके, ले जाकर धरती से सटा दे ,


 चित्र देखे –




लाभ – 

इस आसन को करने से उदर के रोग ठीक होते है ,यह कुल्हो और गुदा स्थान के मध्य स्थित मांसपेशियो को सामान्य रखताहै , साईटिका के स्नायुओ को शिथिल करता है और एड्रिनल ग्रंथी के कार्य को नियमित करता है, कब्ज को ठीक करता है ,

Friday, 11 September 2015

यकृत वृदिध (Enlargement of liver) - कारण और उपचार

परिचय-

पित्त कारक पदार्थो के अत्यधिक सेवन करने से एवम एक्युट हिपेटाईसिस के बाद यकृत की वृदिध हो जाती है,इसे जिगर का बढना भी कहते है.

कारण - 

1.अत्यधिक मशालेदार पदार्थो का सेवन

2.शराब का अधिक मात्रा मे सेवन

3.शरीर मे गर्मी का अधिक मात्रा मे होना

4.अधिक मात्रा मे आराम तलबी का जीवन बिताने पर शरीर मे पित्त की मात्रा बढ जाती है

5. विषैली औषधियो जैसे- संखिया,नाग,स्वर्ण,फास्फोरस,आदि का  अधिक तथा दीर्घकाल तक सेवन करते रहने से.

6.सभी प्रकार के संक्रमण बुखार मे लिवर बढ जाता है

7.लिवर मे एब्सेस होने से

8. पित्त की थैली मे पथरी होने से

9. मधुमेह,संधिवात,उपदंश आदि जीर्ण रोगो मे

10. पित्तप्रणाली का अवरोध होने के कारण यकृत की वृदिध हो जाती है

लक्षण-

1.पेट मे दाहिनी तरफ भारीपन लगना

2.रूक रूक कर तीर जैसा चुभने वाला दर्द

3.रोगी की भूख मारी जाती है

4.अजीर्ण तथा बदहजमी का लक्षण रहता है

5.जिव्हा मे लेप सा चढा रहता है

6.मुँह का स्वाद कडुआ सा रहता है

7.कभी कब्ज रहता है कभी दस्त लगते है

8.रोगी को कभी कभी बुखार रहता है

9.रोगी की आंखे पीली रहती है

10.यदि यकृत उपरकी ओर बढता है तो कंधे की हड्डी मे पीडा होती है तथा नीचे की ओर बढता हैतो पेट मे दर्द होता है

उपचार-

1.रोग के मूल कारण को दुर करना ही इसकी उचित चिकित्सा है

2.आहार -विहार तथा स्वास्थ्यके नियमो का कडाई से पालन करना चाहिये

3.रोगी को कब्ज से बचाने के लिये उचित मृदु  विरेचन देना चाहिये

4.रोगी को दीपन पाचन औषधि देनी चाहिये

5.रोगी को कच्चे पपीते का साग तथा पका पपीता खाने को देना चाहिये

6.रोगी को विश्राम देना चाहिये

7.लिवर पर गरम सेंक करना चाहिये

8.यदि रोगी को बुखार हो तो साबूदाना तथा आरारोट का सेवन कराना चाहिये

सावधानी - 

रोगी का समय पर सही उपचार करा लेना चाहिये तथा किसी चिकित्सक के परामर्श से इलाज लेना  चाहिये, वरना

यह रोग घातक परिणामो की ओर लेजाता है इस रोग का सही इलाज ना होने पर कामला , सिरोसिस ओफ

लिवर आदि रोग हो सकते है

Tuesday, 8 September 2015

गैस के लिये घरेलू उपचार

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गैस के  लिये घरेलू उपचार

1. एक चम्मच नीम्बू का रस , एक चम्मच  पिसी हुई अजवायन ,आधा कप पानी मे मिलाकरसुबह शाम पीये,

2. एक गिलास पानी मे एक नीम्बू  निचोड कर चौथाई चम्मच मीठा सोडा मिलाकर नित्य पीये

3. आधा गिलास गरम जल मे आधा नीम्बू निचोड कर जरा सी पिसी हुई काली मिर्च की फांकी लेकर पानी पी ले

4. सोंठ एक चम्मच, साबुत अजवायन 50ग्राम , नीम्बू के रस मे भिगोकर छाया मे सुखा कर रखे , जब  भी

 खाना खाये ,इसकी एक चम्मच चबाये


5 पेट मे गैस के साथ यदि कब्ज भी हो तो – छोटी हरड को तवे पर सेंक कर पीस ले, तथा इस पाउडर को सुबह 

भुखे पेट गरम पानी से नियमित ले




Saturday, 5 September 2015

कष्टार्तव...”(Dysmenorrhea).. एक कष्ट कारक रोग ...



यह रोग प्रायः थोडा या ज्यादा सभी लडकियो, महिलाओ मे आज कल मिल जाता है ,आज कल का खान पान , रहन-सहन कुछ ऐसा हो गया है जिसके कारण यह रोग अक्सर सब फिमेल्स मे मिल जाता है , कुछ महिलाये इस रोग को लापरवाही के कारण भी इलाज नही करवाती है, कुछ शर्म के कारण भी , मेरी प्रेक्टिस मे मैं ने ऐसी बहुत रोगिणी देखी है जो इस रोग से टीन एज से ही परेसान थी लेकिन उनका इलाज लगभग या तो शादी के कुछ दिन पहले या फिर शादी के बाद ही करवाया गया  है, यह लेख मै उन्ही पढी लिखी बहिन बेटियो के लिये ही लिख रहा हुँ, जो इस रोग की गम्भीरता को नही जानती और समय रहते लापरवाही से इलाज मे कोताही बरतती  है , इस लेख को पढ कर वे इस रोग के बारे मे जानकारी प्राप्त कर रोग से सावधानी पुर्वक बच सकती है तथा कुछ घरेलू  इलाज खुद भी कर सकती है ... , इस लेख को पढे , तथा अपने परिचित लोगो को भी पढाये,
 
परिचय –

इस रोग मे ऋतु ( पिरियड) के समय जोर का दर्द होता है , रक्त कभी कम भी आता हो , चाहे अधिक आता हो , लेकिन रोगिणी दर्द के मारे बैचेन हो जाती है , दर्द इतना भयानक होता है कि कभी – कभी तो रोगिणी बैहोश हो जाती है , दर्द पेट के नीचे के भाग मे होता है , इस रोग को आयुर्वेद मतानुसार योनी गत वायु रोग माना गया है , जिसमे रक्त दुषित हो जाता है तथा वायु को भी दुषित कर देता है, फिर वायु शूल(pain) को जन्म देती है,

रोग के कारण –

1. गर्भाशय(uterus) का विकृत विकास
2.गर्भाशय की रचना मे विकार
3. गर्भाशय का अपनेस्थान से हट जाना
4. गर्भाशय की पेशियो की हीनता
5. रजः स्राव का अप्राकृत होना – इसमे खून के थक्के आते है जिससे पीडा होती है

उपरोक्त सभी  कारण खतरनाक हो सकते है यदि दर्द युक्त पीरियड आता है , तो तत्काल किसी योग्य चिकित्सक से जांच करवा कर इलाज लेना  चाहिये, और यह पता तो अवश्य ही कर लेना चाहिये कि किसी प्रकार की फिजीकल प्रोबलेम तो नही है यदि है तो समय रहते उपचार करवा लेना चाहिये, वरना यह रोग बांझ पन का भी कारण हो सकता है , शादीशुदा जिंदगी को भी बर्बाद कर सकता है ,

कुछ और भी सामान्य कारण है जिनका उपचार सामान्य रूप से किया जा सकता है

अन्य कारण—

1. भय, क्रोध , शोक, मानसिक आवेग ,
2. मिथ्या आहार- विहार, मिथ्या व्यायाम
3. उग्र संगम इच्छा, कृत्रिम या अप्राकृत मैथून , मासिक धर्म के एकदम पहले या बाद पुरूष सहवास
4. कमजोर शरीर , दुबला पन
5. ठंडक आदि के लगने से भी यह रोग हो सकता है
6. इस रोग के बारे मे ज्यादा सोच विचार करने से भी यह रोग हो सकता है

उपरोक्त कारणो से बचा जा सकता है, सामान्य प्रयास करके इस रोग से निजात पाई जा सकती है

  रोग के भेद –

1. रक्ताधिक्यजन्य- खून की अधिकता के कारण (Congesstive) –

यह रोग प्रायः 30 वर्ष की आयु मे होता है, पेट के निचले भाग मे भारीपन होता है , चिड- चिडापन अवसाद , और मानसिक लक्षण भी होते है

2.आकुंचन जन्य(Spasmodic)-आक्षेप के कारण –

यह दर्द लेटने पर कम हो जाता है इस प्रकार के विकार मे दर्दमे पहले दिन से ही होने लगता है , इस विकार से पीडित लडकिया प्रायः कुमारी या निसंतान होतीहै , यह विकार 19 से 21 वर्ष की आयु मे अक्सर होता है, रोगिणी को मिचली या उल्टी होती है

3. झिल्ली दार बाधक (Membranous)—

इस प्रकार के विकार मे झिल्लीदार मासिकधर्म आता है,यह विकार विशेष रूप से अविवाहित महिलाओ मे होता है, यदि विवाहित मे होता है तो वह शिघ्र ही बांझ पन का रूप धारण कर लेता है 

4.स्नायविक (Nervous) नाडीजन्य –

इस विकार मे तीन दिन तक बहुत तेज दर्द होता है , रोगिणी को मिरगी के समान मुर्छा हो जाती है , यह दर्द पेट से शुरूहोकरपीठ और जांघो तक होता है, रोगिणी को सम्भोग के समय भी तीव्र पीडा की अनुभूती होती है

  सामान्य उपचार ---

1. इसरोग मे जहाँ तक हो सके ओपरेशन नही करवाना चाहिये,
2. रोगिणी को पौष्टिक आहार लेना चाहिये
3. रोगिणी को स्वच्छ ,खुली हवा, एवम प्रकाश  मे व्यायाम तथा परिश्रम करना चाहिये
4. अंकुरित धान्य – गेँहू आदि का पर्याप्त मात्रा मे प्रयोग करना चाहिये
5. गर्म पानी से स्नान, शीघ्र पचने वाला आहार लेना चाहिये

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Wednesday, 15 July 2015

दर्द युक्त मासिकधर्म ( Dysmenorrhea ) का घरेलू इलाज --

परिचय-


आयुर्वेद मतानुसार यह एक योनिगत वायु रोग है,जिसमे रक्त दुषित हो जाता है, जिससे मासिकधर्म आने के समय पेट मे नीचे  के भाग मे बहुत ही तेज दर्द होता है जो कि असहनीय होता है रोगिणी के सांस  फूल जाती है पुरे शरीर पर दर्द के कारण पसीने आ जाते है, रोगिणी तडफने लगती है, इस रोग को आयुर्वेद मे कष्टार्तव तथा आधुनिक विज्ञान मे डिस्मेनोरिया (dysmenorrhea)  कहते है


सलाह-

 इस रोग मे यदि समय पर  उचित चिकित्सा ना मिले तो कई बार प्राण संकट मे आ जाते है,प्राण चाहे बाहर ना निकले लेकिन स्थिति कुछ निकलने जैसी ही हो जाती है, इसके लिये उचित इलाज करवाने की व्यवस्था समय पर करनी चाहिये, फिर भी यदि कुछ प्राथमिक उपाय समय पर मिल जाये तो रोगिणी को कुछ समय के लिये ही सही दर्द मे राहत मिल जाये तो अच्छा ही है

चिकित्सा-

आयुर्वेद मे इस रोग को ठीक करने के लिये बहुत औषधियाँ है जिनसे इस कष्टार्तव नामक रोग का उपचार हो सकता है,लेकिन जब कभी यह दर्द होने लगे तथा समय पर किसी चिकित्सक के पास पहुँचना सम्भव नही हो सके तो कुछ घरेलू उपाय किये जा सकते है ,मै यहाँ पर कुछ सामान्य घरेलू नुस्खे लिख रहा हुँ,इसका खुद (यदि पीडित हो तो)  प्रयोग करे तथा अपने परिचित किसी पिडित को भी बताये--

(1)   भोजन मे गुड,दही, अम्ल पदार्थ,मछली,बैंगन,उडद,आदि का पर्याप्त मात्रा मे सेवन करना चाहिये

(2)   मासिक धर्म के समय गर्म पानी से पेडु पर सेंक करना चाहिये और रोगिणी को  गरम पानी पीने को देना चाहिये,

(3)   सोंठ,बदाम,गुड,और घी इन तीनो को मिला कर गर्म करके देना चाहिये

ये उपाय घर पर करने से दर्द मे राहत मिलती है एक कारगर नुस्खा लिख रहा हुँ जिसे प्रयोग कर के रोग मे तत्काल राहत पाई जा सकती है

नुस्खा-

कपास के पौधे की जड             60ग्राम
गाजर के बीज                         60ग्राम
सोया के बीज                          40ग्राम
खरबुजा के बीज                       40ग्राम

इन सबको कूट पीस कर एक जगह मिला ले, फिर करीब 20ग्राम औषधि को एक गिलास पानी मे डाल कर उबाल ले,जब आधा शेष रहे तब छान कर कष्टार्तव से पीडित रोग़िणी को पिलाये तत्काल दर्द मे राहत मिलेगी, इस दवा को लगातार पांच दिन तक सुबह और शाम ले,

इस रोग के बारे मे विस्तृत जानकारी इसी ब्लोग पर मेरी अगली पोस्ट मे मिलेगी, तो पढते रहे मेरा ब्लोग-nirogikaaya.blogspot.com