Monday, 30 January 2017

श्री धनवंतरी चालीसा

                         
                              दोहा

करूं वंदना गुरू चरण रज, ह्रदय राखी श्री राम ।
मातृ पितृ चरण नमन करूँ, प्रभु कीर्ति करूँ बखान ।।1

तव कीर्ति आदि अनंत है , विष्णुअवतार भिषक महान।
हृदय में आकर विराजिए,जय धन्वंतरि भगवान ।।2।।

             चौपाई

जय धनवंतरि जय रोगारी ।
सुनलो प्रभु तुम अरज हमारी।।1।।

तुम्हारी महिमा सब जन गावें ।
सकल साधुजन हिय हरषावे।।2।।


शाश्वत है आयुर्वेद विज्ञाना ।
तुम्हरी कृपा से सब जग जाना ।।3।।

कथा अनोखी सुनी प्रकाशा ।
वेदों में ज्यूँ लिखी ऋषि व्यासा ।।4।।

कुपित भयऊ तब ऋषि दुर्वासा ।
दीन्हा सब देवन को श्रापा ।।5।।

श्री हीन भये सब तबहि  ।
दर दर भटके हुए दरिद्र हि ।।6।।

सकल मिलत गए ब्रह्मा लोका ।
ब्रह्म विलोकत भयेहुँ अशोका ।।7।।

परम पिता ने युक्ति विचारी ।
सकल समीप गए त्रिपुरारी ।।8।।

उमापति संग सकल पधारे ।
रमा पति के चरण पखारे ।।9।।

आपकी माया आप ही जाने ।
सकल बद्धकर खड़े पयाने।।10।।

इक उपाय है आप हि बोले ।
सकल औषध सिंधु में घोंले ।।11।।

क्षीर सिंधु में औषध डारी ।
तनिक हंसे प्रभु लीला धारी ।।12।।

मंदराचल की मथानी बनाई ।
दानवो से अगुवाई कराई ।।13।।

देव जनो को पीछे लगाया ।
तल पृष्ठ को स्वयं हाथ लगाया ।।14।।

मंथन हुआ भयंकर भारी ।
तब जन्मे प्रभु लीलाधारी ।।15।।

अंश अवतार तब आप ही लीन्हा ।
धनवंतरि तेहि नामहि दीन्हा ।।16।।

सौम्य चतुर्भुज रूप बनाया ।
स्तवन सब देवों ने गाया ।।17।।

अमृत कलश लिए एक भुजा ।
आयुर्वेद औषध कर दूजा ।।18।।

जन्म कथा है बड़ी निराली ।
सिंधु में उपजे घृत ज्यों मथानी ।।19।।

सकल देवन को दीन्ही कान्ति ।
अमर वैभव से मिटी अशांति ।।20।।

कल्पवृक्ष के आप है सहोदर ।
जीव जंतु के आप है सहचर ।।21।।

तुम्हरी कृपा से आरोग्य पावा ।
सुदृढ़ वपु अरु  ज्ञान बढ़ावा ।।22।।

देव भिषक अश्विनी कुमारा ।
स्तुति करत सब भिषक परिवारा ।।23।।

धर्म अर्थ काम अरु मोक्षा ।
आरोग्य है सर्वोत्तम शिक्षा ।।24।।

तुम्हरी कृपा से धन्व राजा ।
बना तपस्वी नर भू राजा ।।25।।

तनय बन धन्व घर आये ।
अब्ज रूप धनवंतरि कहलाये ।।26।।

सकल ज्ञान कौशिक ऋषि पाये ।
कौशिक पौत्र सुश्रुत कहलाये ।।27।।

आठ अंग में किया विभाजन ।
विविध रूप में गावें  सज्जन ।।28।।

अथर्ववेद से विग्रह कीन्हा ।
आयुर्वेद नाम तेहि दीन्हा ।।29।।

काय ,बाल, ग्रह, उर्ध्वांग चिकित्सा ।
शल्य, जरा, दृष्ट्र, वाजी सा ।।30।।

माधव निदान, चरक चिकित्सा ।
कश्यप बाल , शल्य सुश्रुता ।।31।।

जय अष्टांग जय चरक संहिता ।
जय माधव जय सुश्रुत संहिता ।।32।।

आप है सब रोगों के शत्रु ।
उदर नेत्र मष्तिक अरु जत्रु।।33।।

सकल औषध में है व्यापी ।
भिषक मित्र आतुर के साथी ।।34।।

विश्वामित्र ब्रह्म ऋषि ज्ञानि।
सकल औषध ज्ञान बखानि ।।35।।

भारद्वाज ऋषि ने भी गाया  ।
सकल ज्ञान शिष्यों को सुनाया।।36।।

काय चिकित्सा बनी एक शाखा ।
जग में फहरी शल्य पताका ।।37।।

कौशिक कुल में जन्मा दासा ।
भिषकवर नाम वेद प्रकाशा ।।38।।

धन्वंतरि का लिखा चालीसा ।
नित्य गावे होवे वाजी सा ।।39।।

जो कोई इसको नित्य ध्यावे ।
बल वैभव सम्पन्न तन पावें ।।40।।

                                दोहा

रोग शोक सन्ताप हरण, अमृत कलश लिए हाथ  ।
ज़रा व्याधि मद लोभ मोह , हरण करो भिषक नाथ ।।
         ।।।इति श्री धन्वंतरि चालीसा।।।


Thursday, 29 December 2016

योग कैसे करे ? समाधान Yoga kaise kare ? Samadhan पार्ट 2. "नियम"

योग के आठ अंग है उनकी बारी बारी से चर्चा करेंगे।हमने गत पोस्ट में 'यम" के बारे में बात की थी। आज हम नियम की चर्चा करेंगे । नियम के बारे में बात करने से पहले यह पुनः जान लेना चाहिए की योग के आठ अंगो में पहला यम है दूसरा नियम है।आगे  आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान , और समाधि इस प्रकार आठ अंग है । इन आठ अंगों का विवेचन करने के बाद हम योग के लाभ के बारे में भी बात करेंगे। लेकिन सबसे पहले योग के पूरे अंगों का पूरा ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही कोई और चर्चा करना ठीक रहेगा। 
आज हम 'नियम" के बारे में जान लेते है । सामान्य भाषा में नियम एक प्रकार की व्यवस्था होती है किसी भी संस्था को चलाने के लिए बनाया गया संविधान ही नियम कहलाता है। किसी भी कार्य योजना को सफल करने के लिए बनाये गए संविधान ही एक प्रकार के नियम होते है हम भी एक बहुत ही बड़ी योजना पर काम कर रहे है अपने आपको परमसत्ता से जोड़ने का काम करने की तैयारी कर रहे है इसलिए नियमो में बांधना बहुत ही जरूरी होता है । जब हम किसी नियम में बंधन की बात करते है तो डर  लगता है।
कोई भी बंधन हो वह डरावना ही होता है । हम जब योग की बात करते है तो योग बंधन से मुक्त करता है। योग तो कुशल बनाता है "योगः कर्मशु कौशलं' कर्म में कुशलता ही योग है।
इन नियमो को हम कुछ बदल देते है। थोड़ी देर थोड़ा अपने लिए ही सोचते है। मेरा तो ध्येय वाक्य भी कुछ ऐसा ही "जान है तो जहान है" और चरक संहिता में भी यह ही लिखा है "सर्वं परित्यज्य शरीरं पालयेत" सब कुछ त्याग कर शरीर का ही पालन करना चाहिए।इस लिए ये नियम भी कुछ अपने खुद के लिए ही समझे और इन्हें जीवन में उतारे ।
नियम पांच होते है
1 शौच
2 संतोष
3 तप
4 स्वाध्याय
5 ईस्वर प्रणिधान
ये पांच नियम है अब इन्हें कुछ इस प्रकार से समझना चाहिए । इनका हम क्रमवार वर्णन करते है ।
                        1 शौच
शौच का मतलब शुचिता से है यानि साफ़ सफाई से । और शौच का मतलब मल का त्याग करना भी होता है ।ये मल शरीर से भी बनते है और मन में भी मल होता है । अतः शरीर और मन की सफाई करने का मतलब ही शौच है ।
क्या करे क़ि हम साफ सुथरे रहे  ??
हमें  रोजाना ही मल का त्याग करना चाहिए । एक दिन भी यदि मल का त्याग न करे तो कई प्रकार के रोगों से आक्रान्त हो सकते है । मल , मूत्र के विसर्जन के साथ साथ मन के विकारों को भी रोजाना थोड़ा थोड़ा साफ़ करते रहना चाहिए । कहते है हम यदि मन में किसी के प्रति कोई बात दबा कर रखते है या मन में कोई गाँठ रखते है तो कब्ज होने की प्रबलतम संभावना रहती है । मन में किसी के प्रति दुर्भावना रखना भी मल को न त्यागने के बराबर है । योग करने से पूर्व मन के विकार और शरीर से निकलने वाले विकारो को त्याग देना चाहिए यह एक दिन में नही होगा इसके लिए नियमित अभ्यास जरूरी होता है।
मन में वैर भाव, ईर्ष्या , द्वेष,छल ,प्रपंच, रखना बहुत ही गलत है  योग करते समय ऐसा  नही होना चाहिए ।
काम क्रोध लोभ मोह अहंकार ये भी विकार है लेकिन इनको तो त्याग करने में पसीनेछूट जाते है और इन्हें छोड़ना भी नही चाहिए । आपको मालूम है जीवन में उत्तम बनाने के लिए चार पुरूषार्थ बताये गए है ।।धर्म अर्थ काम और मोक्ष । अब इनमे काम और अर्थ ये दोनों काम और लोभ के बिना कैसे प्राप्त कर सकते है। अब समस्या ये आती हैक़ि क्या करे ?
समाधान यह है। कि इनको एक नए रास्ते पर ले जाना चाहिए जैसे काम को प्रेम में बदल दे । क्रोध को क्षमा में बदल दे। अहंकार को सेवा में बदल दे। लोभ को दान में बदल दे । बस इसी प्रकार अभ्यास करते करते हम एक दम से बदलते जायेंगे । लेकिन यह सब स्थाई नही रहेगा । जैसे मल मूत्र का रोजाना त्याग करना पड़ता है फिर स्नान मंजन आदि क्रियाओ से शरीर को स्वच्छ रखते है उसी प्रकार मन के मलो को भी त्याग करने बाद साफ़ सुथरा रखने का अभ्यास किया जा सकता है । मै लगातार अभ्यास कर रहा हूँ आप भी करे । बहूत अच्छा महसुश होने लगेगा । अपने आप ही पवित्रता आने लगेगी । मन साफ होने लगेगा । यही अनुभव शौच है ।
                          2.संतोष
हम बार बार सुनते है "संतोषी सदा सुखी" संतोष करने वाला सदा सुखी रहता है। और हमे जीवन में क्या चाहिए । हम सब सुख के लिए ही तो भटक रहे है ।
लेकिन इसके विपरीत हमे यह भी सुनने को मिल जाता है कि "विद्यार्थियों को संतोशी नही होना चाहिए ।" कमाने वाला यदि संतोशी हो गया तो फिर हो गई कमाई । फिर कुछ लोग यह भी कहते है "संतोष का फल मीठा होता है "।
बहुत ही उलझन है । यदि समझ गए तो उलझन समाप्त , नही समझे तो उलझन ही उलझन है । चलो हम आज समझ लेते है कि संतोष क्या है और योग में इसका क्या महत्व है । योग करने से पहले इस नियम का पालन करना क्यों जरूरी है । संतोष का मतलब है हम जो है उसको जीना सीख ले । किसी की नक़ल करना या किसी और के जैसा बनने की चाह असन्तोष है और अपने जैसा बने रहना ही संतोष है ।
प्रकृति ने सभी को एक अलग रूप, स्वभाव, क्षमता प्रदान की है । हमे भी सबसे अलग बनाया है । फिर क्यों दूसरे जैसे बने । अपने आपकी क्षमता योग्यता को पहचान लेना और रोजाना इसको बढ़ाते रहना ही संतोष है ।
कहा गया है विद्यार्थी को और व्यापारी को सन्तोषी नही होना चाहिए । सही कहा है मै तो कहता हूं किसी को भी सन्तोषी नही होना चाहिए । लेकिन कब तक ? जब तक अपने आपको खुद न जान ले। जिस दिन खुद को सच में जान लेंगे उस दिन जीवन में संतोष ही संतोष होगा ।
अब जाने कैसे ? इसके लिए आगे का नियम है ।
                            3. तप
अपने आप को जानने और सक्षम बनाने का नाम ही तप है । लोग तप का नाम सुनते ही भड़क जाते है । ये तप और तपस्या नही करनी हमें ,और इसीलिए लोग योग नही करते है ।
तप से डरने की जरूरत नही है । तप के माध्यम से हम अपने आपको तैयार करते है। ये भी धीरे धीरे ही संभव हो सकेगा । जैसे यह विशेष योग्यता प्राप्त करने की पढ़ाई है । पढ़ाई करना खेल खेलना और किसी भी काम को करने में सक्षम बनाना ही तप है ।
भगवान् से जुड़ने के लिए यह एक बहुत कठिन दिखने वाला सरल नियम है । नियमित अभ्यास से मुर्ख भी विद्वान बन जाता है ।
                          4. स्वाध्याय
अपने आपको पढ़ना, अपना खुद का मूल्यांकन करना,ही स्वाध्याय है । नियमित रूप से अपने बुजुर्गो , अपने आदर्श रूप परमात्मा को अपने अंदर देखना ही स्वध्याय है ।
रोजाना कुछ समय अपने खुद के लिए निकाल कर खुद की कमियां खुद अधिकता यानि गुण और अवगुणों को जानने की कोशिश करनी चाहिए ।
मनुष्य जितना खुद अपने बारे में जानता है उतना दूसरा नही जान सकता । दुसरो द्वारा की गई प्रशंसा का सही मूल्यांकन करके अपना खुद का जीवन बिताना ही सच में स्वध्याय है।
यह नियम भी जीवन को बहुत ही आगे ले जाताहै अपने आपको जीवन में यदि आगे ले जाना है तो अपना अध्ययन अवश्य ही करे ।
                       5 ईश्वर प्रणिधान
जब खुद का ज्ञान हो जाता है तो यह आभास होने लगता है कि मेरे अंदर कोई है जो मुझे गति दे रहा है । बस उसको अपने अंदर बैठाये रखना या उसे सँजोये रखना ही ईश्वर प्रर्निधान है ।
एक ईश्वर अपने अंदर स्थापित करके उस को हमेशा जीवित रखना ही ये पांचवा नियम कहलाता है ।
इन पांचों नियमो का अभ्यास करे और अपने आपको इस परमसत्ता से मिलन के महा प्रयोजन में लगाये रखे । जब हम उस सत्ता से मिलने के काबिल हो जाएंगे तो जरूर मिलन होगा ।
अब नियम के बाद अगला योग है "आसन" । अगली पोस्ट में आसन की पूरी जानकारी , आसन के लाभ ,हानि , क्यों करे आसन , किसे नही करना चाहिए आसन आदि सभी जानकारी आप लोगो को मिलेगी पढ़ते रहे "निरोगी काया"और मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए मुझे ईमेल करे ।
                    
                       

Saturday, 26 November 2016

गाजर (carrut) - बडी गुणकारी है ।

गाजर को सब लोग जानते है । गाजर की केवल सब्जी और सलाद ही नही बनती बल्कि इससे कई प्रकार के व्यंजन भी बनाये जाते है जैसे- गाजर पाक । इसके साथ ही गाजर का उपयोग औषधि में भी लिया जाता है
गाजर में प्रोटीन , वसा, कार्बोहाइड्रेट , रेशे, खनिज तत्व, केल्सीयम, फास्फोरस, लोहा , इत्यादि पाये जाते है। इसमें विटामिन ए , बी,सी, तथा विटामिन बी समूह के थायमिन, रिबोफ्लेविन,तथा निकोटिनिक अम्ल पाये जाते है ।
आयुर्वेद ग्रंथो के अनुसार गाजर तीक्ष्ण,मधुर, कड़वी, गर्म, अग्नीसंदीपन करने वाली , हल्की ग्राही, और रक्तपित्त, बवासीर , संग्रहणी कफ तथा वात नाशक है।
रोगानुसार गाजर को इस प्रकार प्रयोग कर सकते है ।
1. ह्रदय रोग -
5-6 गाजर को अंगारो पर पकाएं या कच्ची  ही छीलकर  रात भर बाहर औंस में रख़ी रहने दें। प्रातः काल केवड़ा या गुलाब अर्क, और मिश्री मिला कर खाने से ह्रदय की धड़कन सामान्य हो जाती है।
गाजर को कद्दूकस करके दूध में उबालें । जब गाजर गल जाए , तो शक्कर मिला कर खाने से दिल को शक्ति मिलती है ।
2. पेट दर्द -
गाजर को भाप में उबाल कर उसमें 10 ग्राम रस निकालें , अब उस रस में 20 ग्राम शहद मिलाकर पीने से पेट दर्द ठीक हो जाता है ।
3. खांसी  -
गाजर स्वरस में मिश्री , काली मिर्च , मिलाकर चाटे।
4. रक्तार्श -
गाजर का रस दही की मलाई के साथ लेने से आराम मिलता है ।
5. मासिक धर्म  -
गाजर का काढ़ा बनाकर सुबह शाम कुछ दिन तक लगातार पीने से मासिक धर्म में होने वाला दर्द नही होता , और मासिक धर्म नियमित आने लगता है ।

Wednesday, 23 November 2016

गुलकंद बनाने की विधि

परिचय -

गुलकंद गुलाब के फूलों से बनाया जाने वाला एक बहुत स्वादिस्ट और स्वास्थ्यवर्धक घरेलु आयुर्वेदिक  औषधि है । यह पित्त का शमन करने वाली दवा है ।

सामग्री -

गुलाब के फूलों की पंखुड़ी - 100 ग्राम
चीनी- 100 ग्राम
सौंप पाउडर -2 चम्मच
इलायची पाउडर -2 चम्मच
शहद- दो चम्मच

विधि

सबसे पहले गुलाब की पंखुड़ियों को साफ़ पानी से धो लें । फिर उसमें बराबर मात्रा में चीनी डालकर अच्छी तरह से मिला लें। सौंफ पाउडर और इलायची पाउडर मिला ले। अंत में शहद मिलाकर अच्छी तरह से फिर से मिला लें।
यह सब करने के बाद कड़ाई में डाल कर हल्की हल्की आंच पर गर्म करले और जब चीनी अच्छी तरह से  पानी छोड़ दे।और चासनी बन जाये तब तक गर्म करे । फिर साफ बर्तन में रख कर ठंडा करने के लिए रख दें।  ठंडा होने के बाद खाने के काम में लें।

Wednesday, 12 October 2016

गुर्दे की पथरी – चमत्कार से बचे

गुर्दे की पथरी – चमत्कार से बचे

गुर्दे की पथरी के दर्द से परेशान रोगी जब भी मेरे पास आता है तो कमर झुकी हुई तथा दोनो हाथ कमर पर जकडे हुये ही आता है, इससे तुरन्त पता चल जाता है कि दर्द बहुत ही तीव्र हो रहा है, जब कभी हम जिससे ज्यादा परेशान होते है तब हमारा ध्यान पुर्णतया उसी विषय पर रहता है रोगी बार बार उसी विषय बात करना पसंद करता है उसी विषय पर बात करने से दर्द कम होता है तथा अन्य बात्त करने पर दर्द बढ जाताहै यह एक मानसिक सोच होती है पथरी का मरीज भी कुछ ऐसा ही सोचता है

तेज दर्द के कारण रोगी का जी घबराता है चिंता की लकीरे चेहरे पर साफ साफ नजर आती है किसी भी बात को लेकर यदि चिंता फिकर होती है तो  पित्तकी वृद्धि हो जाती है तथा पित्त विकृत हो जाता है पित्तवृद्धि के कारण जी मचलता है और उल्टी भी हो सकती है आयुर्वेद के ग्रंथो मे लिखा है “वातातशुलम पित्तातछर्दि”  वात के कारण पथरी मे शूल होता है और पित्त के कारण उल्टी तथा मुत्र मे जलन होतीहै

तेज पीडा के कारण व्यक्ति बैठ नही पाता वह अपनी पीडा को यदि बर्दास्त कर लेता  है तब तक उठक बैठक करता रहेगा लेकिन यदि दर्द बर्दास्त से बाहर हो जाता है तो रोगी बेहोशी भी हो सकता है
इस रोग को वृकाश्मरी, रेनल स्टोन, केल्कुली, गुर्दे की पथरी, आदि नामो से जानते है यह एक बहुत ही पीडादायक तथा कष्टकारक रोग है

यह मुख्य रूप से मिट्टी, रेत के कण ,पानी के साथ या भोजन के माध्यम से पेटमे चले जाने से , बीज युक्तसब्जी जैसे- भींडी, टमाटर, बैंगन, करेलाआदि, एवम प्रोटीन युक्त आहार जैसे – चने की दाल, पनीर, दूध, आदि इन वस्तुओ का अत्यधिक मात्रा मे सेवन करने से हो सकती है तथा मुत्र का नियमित विसर्जन ना करने से, मुत्र को रोक कर रखने से भी यह रोग हो सकता है

लक्षण – इसका मुख्य लक्षण मुत्र मे जलन, मुत्र का सही ढंग से ना आना,अर्थात मुत्र मे रूकावट, तीव्र पेट दर्द,कमर दर्द,उल्टी तथा जी मिचलाना, आदि लक्षण होते है

आयुर्वेद मे इसका बहुत ही सरल इलाज है आयुर्वेद की दवा कैसी भी पथरी हो उसे तोड कर मुत्र मार्गसे बाहर निकालने मे सक्षम होती है इसके अलावा सामान्य पथरी तो बहुत ही सरल और सुगम इलाज से ठीक हो जाती है यदि खान पान सुधार ले तो ही रोग ठीक हो जाता है पथरी छोटी और कही फसी हुई ना हो तो नियमित रूप से दिन मे एक बार कुलथी की दाल तथा दिन मे दो बार जौ का पानी पीने से ही यह बाहर आ जाती है, लोगो को  जौ का पानी पीने को बोलने पर बीयर पीने की पुछते है लेकिन बीयर भी एक प्रकार की शराब ही है इससे पित्त बढ सकताहै इसलिये मै सभी मरीजो को मना ही करता हुँ,

अपने आहार मे कुलथी की दाल को हमेशा शामिल करना चाहिये, इस रोग के लिये कुछ सामान्य घरेलू  दवा भी है जिनका प्रयोग कर के घर बैठे खुद ही रोग को ठीक कर सकते है लेकिन पहले जांच करवा ले कि पथरी कितनी बडी और किस स्थान पर है ,या नही है, कई बार उपरोक्त लक्षण मुत्र के संक्रमण मे भी दिखाई देते है अतः पुर्णतया संतुष्ट होकर ही इलाज कर सकते है  घरेलू नुस्खे इस प्रकार है , जैसे – मुली का रस,  छाछ,  कुलथी की दाल,  केले के डंठल का रस, इन छोटी छोटी औषधियो के प्रयोग से गुर्दे की पथरी बाहर आ जाती है, कई बार तो खूब पानी पीने से ही पथरी मुत्र मार्ग से बाहर आ जाती है,

इस रोग की चिकित्सा के किस्से भी रोगियो द्वारा बताये जाते है ,बहुत ही रोचक कहानिया सुनने को मिलती है कुछ ढोंगी बाबा या नीमहकीम लोग तरह तरह के प्रयोग कर पथरी  निकालने का दावा करते है, कई लोग इस रोग का इलाज अपने दांतो से गुर्दे की जगह पर चुबा कर काटने का नाटक करके पथरी को बाहर निकाल देते है , कुछ लोग चाकू या तलवार से चिरा लगा कर झाडा फूंक करके ड्रामा करके रोग को समूल नष्ट करने का दावा करते है ,कुछ लोग तो बहुत ही सिद्ध और पहुचे हुये होते है वे तो रोगी के गुर्दे पर हाथ फेरते है और पथरी को पकड कर रोगी के हाथ मे थमा देते है, कुछ लोग शक्करको अभिमंत्रित करके देते है और पुरी गारंटी के साथ पथरी निकालने का दावा करते है ,यह सब बाते मेरे पास आने वाले मरीज बतातेहै  ये लोग भी चमत्कार के चक्कर मे चक्कर काट कर आ चुके होते है , मेरी तो ये ही राय है कि समझदार व्यक्ति को  इस प्रकार के चमत्कार के चक्कर मे कभी नही पडना चाहिये,
मेरे पास जब रोगी आता है तो यह सब नुस्खे तथा मंत्र आदि का उपयोग करने के बाद ही आता है, अब इन्हे कौन समझाये कि ये लोग उस पथरी को ही निकाल सकते है जो पहले से ही निकलने वाली होती है एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत पथरी निकल जाती है और ये लोग दावाकर देते है कि हमने पथरी निकाल दी है और लोगो के लिये तो हो गया चमत्कार...

पथरी जब फस जाती है और बहुत बडी होती है तो निकलने मे बहुत ही कठनाई होती है लेकिन आयुर्वेद ग्रंथो मे बहुत सी दवा है जो इस प्रकार की पथरी को भी चुरा बना कर पेसाब के मार्ग से बाहर निकाल देती है मेरे पास आने वाले मरीजो मे लगभग 90% लोगो की पथरी मेरे द्वारा बनाई हुई दवा से पथरी बाहर आ ही जाती है मात्र 10% लोगो की पथरी का ओपरेशन द्वारा उपचार करवाया जाता है, लोग कई बार ई मैल से या फोन करके नुस्खे पुछते है लेकिन इसका कोई एक नुस्खा नही है जो कि बता दिया जाये यह एक प्रक्रिया है जिसमे जिसकी जितनी बडी या छोटी पथरी होती है उसे उसी प्रकार की दवा दी जाती है इसलिये मजबुरी मे लोगो को नुस्खे ना बता कर उनकी सोनोग्राफी रिपोर्ट तथा युरिन रेपोर्ट मंगवाकर घर बैठे इलाज करने की कोशीश करता हुँ नजदीकी मरीज को तो आकर मिलने को ही कहता हुँ , बहुत लोगो ने इलाज लेकर अपनी परेशानी से मुक्ति पाई है

परेशान व्यक्ती हमेशा चमत्कार की आशा मे ही रहता है लेकिन जो रोग बहुत ही परेशान करने वाले है उन रोगो की कभी भी चमत्कारिक दवा ठीक नही रहती तथा ना ही रोगी को किसी प्रकार के चमत्कारिक दवा के चक्कर मे पडना चाहिये कभी कभी हम जल्दी और चमत्कार के फिराक मे बहुत ही बडी परेशानी मे पड सकते है, इस रोग मे किसी आयुर्वेद चिकित्सक से सम्पर्क करके ही चिकित्सा लेनी चाहिये या मुझे ई - मैल द्वारा अपनी सारी रिपोर्ट भेज कर सुरक्षित चिकित्सा प्राप्त करनी चाहिये

इस रोग की आयुर्वेद मे बहुत सी  दवा है  कई आयुर्वेदिक फार्मेसी भी पेटेंट मेडिसिन बनाती है और आम लोग इन्हे इस्तेमाल भी करते है लेकिन मेरी आप लोगो से एक सलाह है कि इन दवाओ का प्रयोग करने से पहले किसी चिकित्सक की सलाह पर अपनी सोनोग्राफी करवाये , पैसाबकी जांच करवाये, तथा यह पता करे कि पथरी कितनी बडी या छोटी है तथा किस स्थिति मे कहा पर है यह सब जानकारी होने के बाद ही चिकित्सा लेनी चाहिये, फालतु मे पैसाबबढानेवाली तथा गुर्दे पर दबाव डालने वाली दवा का प्रयोग नही करना चाहिये,

अच्छी और सच्ची सलाह के लिये पढते रहे NIROGI KAYA निरोगी काया
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Sunday, 18 September 2016

घर मे बनाये हिंग्वाष्टक चुर्ण

घर मे बनाये हिंग्वाष्टक चुर्ण

आयुर्वेद मे कई दवा बहुत ही आसान तरीके से बनाई जा सकती है उन दवाओ को हम घर मे भी बना सकते है ऐसी दवा यदि घर मे बनाई जाये तो यह बहुत ही लाभ कारी हो सकती है, इस प्रकार की दवाओ मे एक दवा है हिंग्वाष्टक चुर्ण,


इस दवा को हम घर मे आराम से बना सकते है तथा इसे उपयोग मे ले सकते है यह दवा पुरे परिवार के लिये बहुत ही लाभकारी होती है ,आजकल की जीवन चर्या इतनी व्यस्त और खान पान के प्रति लापरवाह भरी है कि पेट के विकार लगभग सभी लोगो को हो जाते है बदहजमी, गैस , ऐसिडिटि , कब्ज जैसी बिमारी प्रत्येक घर मे किसी ना किसी को तो मिल ही जायेगी, ऐसी हालत मे रोज रोज चिकित्सक को दिखाना महंगा तो होता ही है साथ ही साथ परेशानी भरा भी हो गया है ,इसलिये यह दवा यदि घर पर ही बना ली  जाये और काम मे ली जाये तो बहुत अच्छा रहेगा


कैसे बनाये हिंग्वष्टक चुर्ण ?

हिंगवाष्टक चुर्ण बनाने की विधि और घटक द्र्व्य –


सौंठ, मिर्च, अजवायन , सेंधा नमक, सफेद जीरा, काला जीरा , इन सात दवाओ को समभाग लेकर महीन चुर्ण करे – बाद मे घी मे भुनी हींग का चुर्ण एक द्रव्य का आठवा भाग लेकर चुर्ण मे मिला कर रखले, यही हिंग्वाष्टक चुर्ण होता है


गुण और उपयोग—

यह चुर्ण उत्तम दीपक पाचकहै अजीर्ण , पेट फूलना,पेट मे वायु भर जाना, पेट दर्द , कुपच हो कर  दस्त होना आदि रोगो मे यह चुर्ण बहुत काम करता है







Friday, 1 July 2016

योग कैसे करे ? समाधान yoga kaise kare ? Samadhan " यम"

  
Yama  यम -

योग जीवन की आवश्यकता है जैसे हम रोज नित्य क्रम मे प्रवृत रहते है यदि ये नित्यक्रम समय पर ना करे तो हम अस्वस्थ हो जाते है उसी प्रकार यदि नित्य क्रम के साथ योग को भी जोड दे तो हम बहुत ही कम बिमार होंगे, आज मै आप लोगो को यह बताने जा रहा हुँ कि योग कैसे करे ?

आप सभी जानते है कि योग को मतलब जोडना होता है आप यह बात बचपन से सीखते आये है कि किसी भी दो वस्तुओ को एक करते है तो उस क्रिया को योग कहते है, एक सामान्य सी लगने वाली बात को समझने केलिये हमारे ऋषियो ने ग्रंथ लिख दिये है उन सभी शास्त्रो मे सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ पतंजली जी की लिखी हुई पतंजली सन्हिता है जिसमे योग की सभी बाते लिखी हुई है  भगवान श्रीकृष्ण ने भी मद्भगवत गीता मे योग का जिक्र किया है आज हम बात कर रहे है कि किसको किससे  जोडे की योग हो जाये और हम स्वस्थ हो जाये, स्वस्थ बनने के लिये किया जाने वाला जोड कोनसा है उसके बारे मे जानेगे

आजकल योग और आयुर्वेद का बहुत ही प्रचार प्रसार हो रहा है इसलिये लगभग लोग यह बात जानते है कि योग क्या है योग के बारे ज्यादा  बताने से अच्छा है कि योग कैसे करे इसी मुद्दे पर बात करे तो अच्छा रहेगा,  मै ने योग करने मे आने वाली परेशनियो के बारे मे बात मेरी  पोस्ट – “योग कैसे  करे  ? समस्याये” मे  की थी और आप लोगो को बताया था कि जल्दी ही इन समस्याओ का समाधान भी बताउंगा तो पेश है मेरे द्वारा किया गया एक अनुभव जिससे मेरा जीवन आनंद दायक बन गया आप भी करे मै वादा करता हुँ निश्चित रूप से आप लोगो का जीवन भी आनंददायक बन जायेगा, पोईंट टु पोईंट बात करते है

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 सबसे पहले यह जाने की हमे करना क्या है जैसे हम किसी भी काम को करने की तैयारी करते है तो उस कार्य के बारे मे पुरी जानकारी लेते है फिर उस काम को करने मे लग जाते है

योग के आठ अंग होते है—यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार, धारना ,ध्यान और समाधि, इन आठ अंगो को सबसे पहले पहले समझना जरूरी है एक एक अंग की जानकारी लेते है

यम –

आज  हम  यम  के बारे  मे  बाते  करेंगे, जो सन्हितायो मे  लिखा है  उस प्रकार से नही जबकि जो मैं ने अनुभव किया  है  या युँ कहे जो मै ने किया  है वह  बताता हुँ,

 ये पांच होते है अहिंसा, सत्यभाषण , चोरी ना करना, ब्रह्मचर्य का पालन, और अपरिग्रह मतलब धन का संग्रह ना करना,

जब हम किसी काम को अंजाम तक ले जाना चाहते है तो उस कार्य की पुरी तैयारी करते है ये योग का पहला अंग  यम भी एक प्रकार की पुर्व तैयारी है बहुत ही कठिन है ये सब करना ,ऐसा लगता है बहुत ही मुश्किल है, लेकिन यदि इन सबकी परिभासा बदल दी जाये तो यह कार्य बहुत ही सरल हो जायेगा , हम इनको कुछ इस प्रकार परिभासित करेंगे जैसे पहला है –

 अहिंसा –

 मतलब हिंसा ना करना किसी को कष्ट ना पहुचाना किसी का दिल ना दुखाना आदि होते है लेकिन हमे क्या करना है कुछ दिन अपने आपको कष्ट नही पहुचाना, हमे अपने आप से  यह प्रतिज्ञा करनी है कि  अपने आपको खुस रखुंगा अपने आपको कोई भी कष्ट नही दुंगा, दुनिया कुछ भी कहे मै बस अपने आपके लिये ही जीने की कोशीश करुंगा और खूब मस्ती से जीने की कोशीश करुंगा, बस ! अपने आपको  परेशान ना करना यही अहिंसा है,

सत्य भाषण –

 इसमे अपने आपसे यह वादा करना कि  मै कभी भी अपने आपसे झुठ नही बोलुंगा, अपने आपसे झुठ बोलने का मतलब है कि रात को मन मे सोचा कि कल से व्यायाम करुंगा और सुबह जगते ही दिमाग से निकाल दिया कि आज नही कल करुंगा यह असत्य है इसे सबसे पहले अपने लिये शुरू करो,यह मन मे पक्का विचार बना लेना चाहिये कि खुद से जो भी वादा करुंगा वह उसी समय मे जरूर पुरा करने की कोशीश करुंगा ,

 चोरी ना करना – 

कैसी चोरी ? कभी आपने ने भी की होगी चोरी, मेरी नजर मे काम को टाल देना चोरी है, बहुत ही तेज भूख लगी है और भूख को अंट शंट खा कर खराब कर लेना चोरी है , किताब को हाथ मे लेकर मोबाईल पर चेटिंग करना चोरी है, किसी का धन चुराना ही चोरी नही होता है ये सब भी चोरी के ही उदाहरण है बस इस प्रकार की चोरी ज्यादा खतरनाक होती है

 ब्रह्मचर्य का पालन करना --

इसे प्रबंधन से जोडे जैसे समय का प्रबंधन , धन का प्रबंधन, उसी प्रकार जीवन का प्रबंधन, किसी भी गलत काम मे समय , धन और यह शरीर खराब नही करुंगा, किसी भी वस्तु को  बेमतलब खर्च ना करना ही ब्रह्मचर्य है ,

अपरिग्रह—

धन का संचय ना करना अपरिग्रह कहलाता है, सबसे  मुश्किल है सबसे पहले  यह समझना कि धन कौनसा है जिसका हमे अपरिग्रह करना है, धन है अपने अंदर की महत्वकांक्षाये , इन्हे ज्यादा संग्रह करने से बहुत ही नुकसान हो सकता है ,यदि अति महत्वाकाक्षाये होती है तो लोभ की उत्पत्ति होती है फिर काम की उत्पत्ति होती है काम की पुर्ति ना तो क्रोध की उत्पत्ति होती है, मनुष्य को महत्वकांक्षी होना  चाहिये लेकिन उसे अति मात्रा मे संचय नही करना चाहिये

उपरोक्त सभी बाते आप समझ गये होंगे अब आगे बात करेंग “नियम”  की .... तो पढते रहे निरोगीकाया ....