Wednesday, 1 March 2017

नाड़ी परीक्षा :- रोग परीक्षण की पुरानी पद्धति

मैं  26 फरवरी 2017 को भरतपुर ,राजस्थान में  "आधुनिक परिपेक्ष्य में नाड़ी निदान का महत्त्व" विषय पर आयोजित सेमीनार में भाग लेने गया था । इस सेमीनार के आयोजक "राजस्थान ह्रदय रोग चिकित्सा समिति" एवं  "आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर राजस्थान" (अमोर) थे। यह सेमीनार पूर्ण रूप से स्वतन्त्र सम्भासा थी इसमें राजकीय अनुदान प्राप्त नही हुआ था इसलिए भी यह ज्यादा महत्वपूर्ण थी । क्योंकि राजस्थान में इस प्रकार की यह शायद पहली ही सम्भासा (सेमीनार) थी ।

इस सेमिनार में नया अहसास हुआ। बहुत ही नयापन देखने को मिला । हालांकि विषय पूराना था । जो क़ि लगभग लुप्त हो चुका है । कोई भी आयुर्वेद चिकित्सक आजकल इस रोग परिक्षण की विधा को रोग परिक्षण में प्रयोग नही करते है । हालांकि हाथ लगाकर ये जरूर देख लेते है कि नाड़ी (puls) चल रही है या नही । इसके अलावा इस  विधा का जो महत्वपूर्ण पार्ट है उसकी तरफ किसी किसी आयुर्वेद चिकित्सक का ही ध्यान जाता होगा अमूमन यह पद्धति लुप्त हो चुकी है ।पहले ज़माने में जरूर कई लोग "नाडिया वैद्य" के नाम से जाने जाते थे । आजकल यह सब चलन में नही है ।

राजस्थान हृदय रोग चिकित्सा समिती के अध्यक्ष डॉ चंद्रप्रकाश दीक्षित ने इस विषय पर एक पुस्तिका लिख़ी है और गहन अध्ययन करने के बाद यह सेमीनार आयोजित करवाई जोकि बहुत ही अच्छा कार्य है ।

इस सेमिनार की दो ख़ास बाते रही एक तो यह क़ि यह विषय पुराना था , और दूसरी बात यह थी क़ि इस विषय पर भाग लेने वाले आयुर्वेद जगत के वे लोग थे जो आयुर्वेद की पुरानी विधाओं (जैसे अग्निकर्म, जलोका, पंचकर्म , नाड़ी परीक्षा)  को जन सामान्य तक लाने के लिए नये और  सृजनात्मक  तरीके से आयुर्वेद का प्रचार करना चाहते है जिनको डॉ विमलेश विनोद कटारा ने "अमोर" नाम दिया है ।

नये और पुराने का यह मेल मुझे बहुत ही अच्छा लगा ।क्योकि जब सामने से कोई चमकदार रोशनी आती है तो उस रोशनी से आँखे चौंधिया जाती है । जोकि आजकल आयुर्वेद के साथ हो रहा है सब कुछ आधुनिक होता जा रहा है कुछ भी दिखाई नही दे रहा है आयुर्वेद किस ओर जा रहा है और चौन्धियाये हुए आँखों को मिचमिचाते हुए आयुर्वेद विशेषज्ञ कहा चले जा रहे है । कुछ भी समझ में नही आ रहा है । सरकार भी आयुर्वेद के आधुनिकीकरण के नाम पर वेलनेश सेंटर खोल कर आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर्स से आधुनिक चिकित्सा करवाने लगी है ।ऐसा लगने लगा है कि आधुनिकता के नाम पर आयुर्वेद को और  आयुर्वेद की वास्तविक आत्मा को समाप्त किया  जा रहा है । आयुर्वेद को हर्बल नाम देकर भी आधुनिक बनाया जा रहा है ।

आयुर्वेद की रोग निदान (डायग्नोस) पद्धति तो लगभग चिकित्सक भूल चुके है । रोगों का नाम भी अब वात पित्त कफ जनित न होकर मॉडर्न पद्धति के अनुसार होते जा रहे है । ये सब जरूरी भी है क्योंकि जिंदगी की दौड़ में यदि कदम मिलाकर चलना है तो गति को तेज रखना ही पड़ता है । लेकिन अपनी संस्कृति को भूल कर दुसरो की संस्कृति अपना लेना बुद्धिमानी नही हो सकती । अपनी विधा को सदैव जिंवंत रखना हमारा कर्तव्य है । सामने से आने वाली रोशनी आँखों को बाधित करती है। लेकिन जब वही रोशनी पीछे से आये तो रास्ता साफ साफ दिखाई देने लगता है ।

इस सेमिनार में दो प्रबुद्ध विद्वानों के व्याख्यान भी सुनने को मिले जो बहुत ही सारयुक्त और प्रेरित करने वाले थे ये महान हस्ती थे एक आयुर्वेद जगत के महान लेखक डॉ बनवारी लाल गौड़ और दूसरे आई .एफ .ओ. श्री दीप नारायण पांडे । श्री पांडे जी की कही हुई कुछ बातों ने भी मुझे आत्म चिंतन के लिए मजबूर कर दिया । सभी उपस्थित अमोर्स से एक बात कही क़ि आयुर्वेद चिकित्सको के परिवारों में केंसर, डाइबिटीज, बी पी , मानसिक रोग और मोटापा ये पांच प्रकार के  रोग होने ही नही चाहिए । परिवारों के अलावा सगे संबंधियों को भी इन रोगों से बचा के रखना आप लोगो का कर्तव्य  है । क्योंकि आप लोगो का पहला उद्दयेश्य "स्वस्थयस्य स्वास्थ्य रक्षणम" है । सिर्फ आयुर्वेद ही वो चिकित्सा पद्धति है जो सबको स्वस्थ रखने की क्षमता रखती हैं। उनके विचारों से लगा कि जनता जनार्दन को हमसे कितनी अपेक्षाएं है और हम भाग रहे है मॉडर्न साइंस की ओर ।

डॉ दीक्षित के नाड़ी निदान का आधुनिक परिपेक्ष्य में क्या महत्त्व है इस विषय पर दिए गए व्याख्यान सुनकर शास्त्रोक्त ज्ञान का महत्त्व समझ में आया ।

डॉ चंद्रप्रकाश दीक्षित की लिखी पुस्तक "आयुर्वेदीय निदान की अनूठी पद्धति :- नाड़ी परीक्षा" का विमोचन भी किया गया । जिसमे उन्होने आयुर्वेद की संहिताओं और निघंटुओ में से नाड़ी के बारे में लिखी व्याख्याओं को बहुत सरल तरीके से लिखा है। आयुर्वेद चिकित्सको के लिए यह लघु पुस्तक बहुत ही कारगर साबित हो सकती है । नाड़ी परीक्षा के सम्बन्ध में योग रत्नाकर में लिखा है :-
"रोगाक्रान्तस्य शरीरस्य स्थानान्यष्टौ परिक्षयेत ।
नाड़ी मुत्रं  मलं जिव्हा शब्दम स्पर्श दर्गाकृती ।।"
इस अष्टविद परीक्षा में नाड़ी परीक्षा को प्रथम स्थान पर रखा है ।

नाड़ी परीक्षा की इस सेमिनार के बहाने से पुरानी आयुर्वेद की धरोहरो को जनसामान्य के लिए सामने लाने की यह पहल आयुर्वेद चिकित्सको के लिए पीछे  से आती, रास्ता दिखाती रोशनी के समान है । अंधेरो से घिरे रास्ते में लोगो की वांछित अपेक्षाओं को पूर्ण करने लिए का हम सबको मिलकर इसका स्वागत करना चाहिए । और इस प्रकार की स्वतन्त्र सम्भासाओ का आयोजन करते रहना चाहिए ।

डॉ वेदप्रकाश कौशिक
आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर राजस्थान

Wednesday, 22 February 2017

पारद :- जीवन का रस है ।

पारद ने बहुत ही प्रभावित किया था । पारद की उत्पत्ति की कथा पढ़कर मैं बहुत ही आश्चर्य चकित हुआ । हमे रस शास्त्र पढ़ाने वाले हमारे गुरू जी वैद्य श्री आंगिरस जी ने जब यह कथा बताई तो विश्वास ही नही हुआ ।लेकिन हो सकता है सत्य हो । अभी भी पूरा विश्वास तो नही होता लेकिन बात में कुछ तो तथ्य जरूर है। लगता है यह पारद ही जीवन का रस है । ये पुराणों में लिखी कथाएं कभी कभी  अविश्वसनीय सी लगती है लेकिन  इन में बड़ा ही सार भरा रहता है ।


आयुर्वेद ग्रंथो में पारद को बहुत ही महत्वपूर्ण औषधि बताई गई है । पारद के मिश्रण से बहुत दवाओं का निर्माण होता है । आयुर्वेद में जितने भी रस नाम से जो औषधियां है वे सभी पारद से ही बनी है । जैसे - रस सिंदूर, त्रिभुवन कीर्ति रस , लक्ष्मी विलास रस, कामदुधा रस, आदि ।

पारद को सामान्यत पारा भी कहा जाता है । इसके पांच भेद है - रस , रसेन्द्र, सूत, पारद ,और मिश्रक । इसको भगवान् शिव जी का वीर्य माना जाता है।

पारदो रस धातुश्च रसेन्द्रश्च महारसः ।
चपलः शिववीर्यश्च रसः सूतः शिवाहण्यः।।
रसेन्द्रः पारदः सूतः हरजः सुतको रसः ।
मिश्रकश्चेति नामानि ज्ञेयानि रस कर्मसु ।।

इन भेद की चर्चा के साथ उत्पत्ति की रोचक कहानी भी जानना बहुत जरूरी है । कथा कुछ इस प्रकार है ।

Saturday, 11 February 2017

मूली (Raddish)


मूली का कन्द गाजर के समान, परंतु सफेद होता है । पत्ते नवीन सरसो के पते के समान, फूल सफेद,सरसो के फूलो के आकार के और फल भी सरसो के समान ही होते है। उन्हें "सोगरी" कहते है । बीज सरसो से बड़े होते है ।
बीजो में उड़नशील तैल होता है ।कन्द में आर्सेनिक 0.1मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम में रहता है।
मूली भूख बढ़ाने , पेट के कीड़े नष्ट करने वाली, पाईल्स, और सभी प्रकार की सूजन को ठीक करने में उपयोगी है ।
आयुर्वेद के अनुसार कच्ची मूली कटु, तिक्त, उष्ण, रुचिकारक, पाचन, मधुर, बल्य, तथा मूत्र विकार, अर्श, क्षय, श्वास, कास, नेत्ररोग, एवं वात,पित्त, कफ,और रक्त विकारो को दूर करती है ।
पुरानी मूली चरपरी, गरम, अग्निवर्धक, होती है ।
मूली की फली सोगरी किंचित गरम और किंचित कफ और वात नाशक होती है ।
मूली - सब्जी, सलाद, के साथ साथ आयुर्वेद चिकित्सा में भी उपयोगी है । इसको अलग अलग प्रकार से प्रयोग कर रोगों का उपचार भी किया जा सकता है ।
आयुर्वेद चिकित्सा में मूली को रोगानुसार इस प्रकार प्रयोग किया जाता है ---
कामला रोग
मूली के ताजे पत्तो को जल के साथ पीसकर उबाल ले , दूध की भांति झाग ऊपर आ जाता है इसको छान कर दिन में तीन बार पीने से कामला रोग मिटता है ।
पीलिया में मूली की सब्जी खानी चाहिए ।
यकृत प्लीहा रोग
मूली की चार फांक कर के छः ग्राम पिसा नौसादर छिड़क कर रात को ओस में रख कर सुबह जो पानी निकले उसको पीकर ऊपर से मूली की फांक खाने से फायदा होता है ।
पथरी
मूली के पत्तो को 10 ग्राम रस में अजमोद मिलाकर पीना चाहिए । पथरी पिघल जाती है ।
बवासीर
मूली के पत्तो को छाया में सुखा कर पीसकर समान मात्रा में शक्कर मिलाकर 40 दिन तक 25 से 50 ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए ।
मासिक धर्म
मूली के बीजों के चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में देने से मासिक धर्म की रूकावट दूर होती है । गर्भवती महिला को मूली के बीजो का सेवन नही करना चाहिए । वरना गर्भपात होने की संभावना हो सकती है ।
दाद
मूली के बीजो को नींबू में पीसकर लगाने से दाद में लाभ होता है ।
इंद्रिय शैथिल्य
किसी किसी व्यक्ति को इंद्रिय शैथिल्य ( शिश्न में उत्तेजना न होना) रोग हो जाता है ।इस रोग में यदि मूली के बीजो को तेल में औटाकर उस तेल की कामेन्द्रिय(शिश्न)  पर मालिश की जाये तो शिथिलता समाप्त हो जाती है और उत्तेजना पैदा होती है ।
इस प्रकार साधारण सी दिखनी वाली मूली हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है । इसलिए मूली का सेवन अवश्य ही करना चाहिए ।

Friday, 10 February 2017

रस सिंदूर : धातु वृद्धि (Sex power) में है उपयोगी ।

आज हम एक बहुत ही महत्वपूर्ण औषधि की बात कर रहे है , जिसका नाम है रस सिंदूर । यह एक कुपिपक्व रसायन औषधि है । यह औषधि शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक के मिश्रण से कुपिपक्व विधि से तैयार की जाती है ।

यह औषधि बहूत ही उत्तम रसायन है । यह गुण धर्म के हिसाब से उष्ण वीर्य है । पारद और गंधक का यह कल्प शरीर के अंगों की क्रिया को बढ़ाता है । अनुपान भेद से अनेक रोगों को इसका मिश्रण नाश करता है । यह कफ प्रधान रोगों की उत्तम दवा है ।

यह उष्ण होने के कारण पित्त प्रधान रोगों में स्वतन्त्र रूप से प्रयोग में नही लिया  जाता है यदि पित्त शामक औषधि जैसे प्रवाल पिष्टी, कामदूधा रस, गिलोय सत्व आदि किसी भी औषधि को मिला कर दे तो पित्त प्रधान रोगों में भी अच्छा फल प्राप्त किया जा सकता है ।

कफ प्रधान सन्निपात , न्यूमोनिया, इन्फ्लूएंजा, श्वास रोग, पुराना कफज कास, आदि रोगों में कफ संचित होकर रोग बढ़ते जाते हो, साथ ही दूषित कफ होने के कारण इनके उपद्रव भी बढ़ते जाते हो, तो ऐसे समय में रस सिंदूर बहुत ही अच्छा काम करता है ।

सुखी खांसी में रस सिंदूर अकेले न देकर प्रवाल भस्म या पिष्टी के साथ सितोपलादि चूर्ण , च्यवनप्राश के साथ देने से लाभ होता है ।

रोगानुसार उपयोग :-

नवज्वर (Instant fever) में रस सिंदूर गोदन्ती हरताल भस्म के साथ मिला कर तुलसी पत्र स्वरस से देने से लाभ मिलता है ।

जीर्ण ज्वर (Chronic fever) में रस सिंदूर , पित्त पापड़ा, धनिया, और गिलोय का क्वाथ (काढ़ा) बना कर शहद मिला कर पिने से लाभ मिलता है ।

अर्श (Piles) रस सिंदूर को छोटी हरड़ के साथ देने से आराम मिलता है।

श्वास ( Asthama) में रस सिंदूर और विभीतक चूर्ण का मिश्रण लाभ करता है ।

कामला में रस सिंदूर , स्वर्ण माक्षिक भस्म, और कसीस भस्म को मिलाकर देने से लाभ मिलता है ।

और भी बहुत से रोग है जिनमे रस सिंदूर किसी अन्य दवा के मिश्रण से बहुत ही अच्छा लाभ करती है ।

निम्न  प्रमुख रोग है जिनमे यह काम करती हैं।

पांडु, अजीर्ण, उदरशूल, मूर्च्छा, सर्वांग शौथ, अपस्मार, भगंदर, गुल्म आदि रोगों में भी अन्य औषधि के मिश्रण से यह दवा उत्तम कार्य करती है

इनके अलावा शरीर को बलवान बनाने, धातु वृद्धि  के लिए , वाजीकरण के लिए, स्वप्न दोष को दूर करने आदि के लिए भी यह औषधि बहुत ही कामयाब है ।

धातु वृद्धि के लिए :- यह धातु को बढ़ाने के लिए , वीर्य को गाढ़ा करने के लिए , शीघ्र पतन और स्वप्न दोष की बहुत ही उत्तम दवा है । निम्न लिखित मिश्रण बना कर अपना जीवन उत्तम बनाये ।

1. रस सिंदूर 1 रत्ती
    बंग भस्म 1 रत्ती
    स्वर्ण भस्म 1/4रत्ती
     मलाई के साथ

2.   या लौंग, केशर , जावित्री, अकरकरा, पीपल, प्रत्येक 1 -1 भाग तथा कपूर, भांग, अफीम, और नाग भस्म, आधा आधा भाग लेकर, सबका यथा विधि चूर्ण बनावे। एक माशा इस चूर्ण के साथ 1 रत्ती की मात्रा में रस सिंदूर लेना चाहिए ।

इसका प्रयोग किसी योग्य चिकित्सक के परामर्श से ही करना चाहिए ।

Monday, 30 January 2017

श्री धनवंतरी चालीसा

                         
                              दोहा

करूं वंदना गुरू चरण रज, ह्रदय राखी श्री राम ।
मातृ पितृ चरण नमन करूँ, प्रभु कीर्ति करूँ बखान ।।1

तव कीर्ति आदि अनंत है , विष्णुअवतार भिषक महान।
हृदय में आकर विराजिए,जय धन्वंतरि भगवान ।।2।।

             चौपाई

जय धनवंतरि जय रोगारी ।
सुनलो प्रभु तुम अरज हमारी।।1।।

तुम्हारी महिमा सब जन गावें ।
सकल साधुजन हिय हरषावे।।2।।


शाश्वत है आयुर्वेद विज्ञाना ।
तुम्हरी कृपा से सब जग जाना ।।3।।

कथा अनोखी सुनी प्रकाशा ।
वेदों में ज्यूँ लिखी ऋषि व्यासा ।।4।।

कुपित भयऊ तब ऋषि दुर्वासा ।
दीन्हा सब देवन को श्रापा ।।5।।

श्री हीन भये सब तबहि  ।
दर दर भटके हुए दरिद्र हि ।।6।।

सकल मिलत गए ब्रह्मा लोका ।
ब्रह्म विलोकत भयेहुँ अशोका ।।7।।

परम पिता ने युक्ति विचारी ।
सकल समीप गए त्रिपुरारी ।।8।।

उमापति संग सकल पधारे ।
रमा पति के चरण पखारे ।।9।।

आपकी माया आप ही जाने ।
सकल बद्धकर खड़े पयाने।।10।।

इक उपाय है आप हि बोले ।
सकल औषध सिंधु में घोंले ।।11।।

क्षीर सिंधु में औषध डारी ।
तनिक हंसे प्रभु लीला धारी ।।12।।

मंदराचल की मथानी बनाई ।
दानवो से अगुवाई कराई ।।13।।

देव जनो को पीछे लगाया ।
तल पृष्ठ को स्वयं हाथ लगाया ।।14।।

मंथन हुआ भयंकर भारी ।
तब जन्मे प्रभु लीलाधारी ।।15।।

अंश अवतार तब आप ही लीन्हा ।
धनवंतरि तेहि नामहि दीन्हा ।।16।।

सौम्य चतुर्भुज रूप बनाया ।
स्तवन सब देवों ने गाया ।।17।।

अमृत कलश लिए एक भुजा ।
आयुर्वेद औषध कर दूजा ।।18।।

जन्म कथा है बड़ी निराली ।
सिंधु में उपजे घृत ज्यों मथानी ।।19।।

सकल देवन को दीन्ही कान्ति ।
अमर वैभव से मिटी अशांति ।।20।।

कल्पवृक्ष के आप है सहोदर ।
जीव जंतु के आप है सहचर ।।21।।

तुम्हरी कृपा से आरोग्य पावा ।
सुदृढ़ वपु अरु  ज्ञान बढ़ावा ।।22।।

देव भिषक अश्विनी कुमारा ।
स्तुति करत सब भिषक परिवारा ।।23।।

धर्म अर्थ काम अरु मोक्षा ।
आरोग्य है सर्वोत्तम शिक्षा ।।24।।

तुम्हरी कृपा से धन्व राजा ।
बना तपस्वी नर भू राजा ।।25।।

तनय बन धन्व घर आये ।
अब्ज रूप धनवंतरि कहलाये ।।26।।

सकल ज्ञान कौशिक ऋषि पाये ।
कौशिक पौत्र सुश्रुत कहलाये ।।27।।

आठ अंग में किया विभाजन ।
विविध रूप में गावें  सज्जन ।।28।।

अथर्ववेद से विग्रह कीन्हा ।
आयुर्वेद नाम तेहि दीन्हा ।।29।।

काय ,बाल, ग्रह, उर्ध्वांग चिकित्सा ।
शल्य, जरा, दृष्ट्र, वाजी सा ।।30।।

माधव निदान, चरक चिकित्सा ।
कश्यप बाल , शल्य सुश्रुता ।।31।।

जय अष्टांग जय चरक संहिता ।
जय माधव जय सुश्रुत संहिता ।।32।।

आप है सब रोगों के शत्रु ।
उदर नेत्र मष्तिक अरु जत्रु।।33।।

सकल औषध में है व्यापी ।
भिषक मित्र आतुर के साथी ।।34।।

विश्वामित्र ब्रह्म ऋषि ज्ञानि।
सकल औषध ज्ञान बखानि ।।35।।

भारद्वाज ऋषि ने भी गाया  ।
सकल ज्ञान शिष्यों को सुनाया।।36।।

काय चिकित्सा बनी एक शाखा ।
जग में फहरी शल्य पताका ।।37।।

कौशिक कुल में जन्मा दासा ।
भिषकवर नाम वेद प्रकाशा ।।38।।

धन्वंतरि का लिखा चालीसा ।
नित्य गावे होवे वाजी सा ।।39।।

जो कोई इसको नित्य ध्यावे ।
बल वैभव सम्पन्न तन पावें ।।40।।

                                दोहा

रोग शोक सन्ताप हरण, अमृत कलश लिए हाथ  ।
ज़रा व्याधि मद लोभ मोह , हरण करो भिषक नाथ ।।
         ।।।इति श्री धन्वंतरि चालीसा।।।


Thursday, 29 December 2016

योग कैसे करे ? समाधान Yoga kaise kare ? Samadhan पार्ट 2. "नियम"

योग के आठ अंग है उनकी बारी बारी से चर्चा करेंगे।हमने गत पोस्ट में 'यम" के बारे में बात की थी। आज हम नियम की चर्चा करेंगे । नियम के बारे में बात करने से पहले यह पुनः जान लेना चाहिए की योग के आठ अंगो में पहला यम है दूसरा नियम है।आगे  आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान , और समाधि इस प्रकार आठ अंग है । इन आठ अंगों का विवेचन करने के बाद हम योग के लाभ के बारे में भी बात करेंगे। लेकिन सबसे पहले योग के पूरे अंगों का पूरा ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही कोई और चर्चा करना ठीक रहेगा। 
आज हम 'नियम" के बारे में जान लेते है । सामान्य भाषा में नियम एक प्रकार की व्यवस्था होती है किसी भी संस्था को चलाने के लिए बनाया गया संविधान ही नियम कहलाता है। किसी भी कार्य योजना को सफल करने के लिए बनाये गए संविधान ही एक प्रकार के नियम होते है हम भी एक बहुत ही बड़ी योजना पर काम कर रहे है अपने आपको परमसत्ता से जोड़ने का काम करने की तैयारी कर रहे है इसलिए नियमो में बांधना बहुत ही जरूरी होता है । जब हम किसी नियम में बंधन की बात करते है तो डर  लगता है।
कोई भी बंधन हो वह डरावना ही होता है । हम जब योग की बात करते है तो योग बंधन से मुक्त करता है। योग तो कुशल बनाता है "योगः कर्मशु कौशलं' कर्म में कुशलता ही योग है।
इन नियमो को हम कुछ बदल देते है। थोड़ी देर थोड़ा अपने लिए ही सोचते है। मेरा तो ध्येय वाक्य भी कुछ ऐसा ही "जान है तो जहान है" और चरक संहिता में भी यह ही लिखा है "सर्वं परित्यज्य शरीरं पालयेत" सब कुछ त्याग कर शरीर का ही पालन करना चाहिए।इस लिए ये नियम भी कुछ अपने खुद के लिए ही समझे और इन्हें जीवन में उतारे ।
नियम पांच होते है
1 शौच
2 संतोष
3 तप
4 स्वाध्याय
5 ईस्वर प्रणिधान
ये पांच नियम है अब इन्हें कुछ इस प्रकार से समझना चाहिए । इनका हम क्रमवार वर्णन करते है ।
                        1 शौच
शौच का मतलब शुचिता से है यानि साफ़ सफाई से । और शौच का मतलब मल का त्याग करना भी होता है ।ये मल शरीर से भी बनते है और मन में भी मल होता है । अतः शरीर और मन की सफाई करने का मतलब ही शौच है ।
क्या करे क़ि हम साफ सुथरे रहे  ??
हमें  रोजाना ही मल का त्याग करना चाहिए । एक दिन भी यदि मल का त्याग न करे तो कई प्रकार के रोगों से आक्रान्त हो सकते है । मल , मूत्र के विसर्जन के साथ साथ मन के विकारों को भी रोजाना थोड़ा थोड़ा साफ़ करते रहना चाहिए । कहते है हम यदि मन में किसी के प्रति कोई बात दबा कर रखते है या मन में कोई गाँठ रखते है तो कब्ज होने की प्रबलतम संभावना रहती है । मन में किसी के प्रति दुर्भावना रखना भी मल को न त्यागने के बराबर है । योग करने से पूर्व मन के विकार और शरीर से निकलने वाले विकारो को त्याग देना चाहिए यह एक दिन में नही होगा इसके लिए नियमित अभ्यास जरूरी होता है।
मन में वैर भाव, ईर्ष्या , द्वेष,छल ,प्रपंच, रखना बहुत ही गलत है  योग करते समय ऐसा  नही होना चाहिए ।
काम क्रोध लोभ मोह अहंकार ये भी विकार है लेकिन इनको तो त्याग करने में पसीनेछूट जाते है और इन्हें छोड़ना भी नही चाहिए । आपको मालूम है जीवन में उत्तम बनाने के लिए चार पुरूषार्थ बताये गए है ।।धर्म अर्थ काम और मोक्ष । अब इनमे काम और अर्थ ये दोनों काम और लोभ के बिना कैसे प्राप्त कर सकते है। अब समस्या ये आती हैक़ि क्या करे ?
समाधान यह है। कि इनको एक नए रास्ते पर ले जाना चाहिए जैसे काम को प्रेम में बदल दे । क्रोध को क्षमा में बदल दे। अहंकार को सेवा में बदल दे। लोभ को दान में बदल दे । बस इसी प्रकार अभ्यास करते करते हम एक दम से बदलते जायेंगे । लेकिन यह सब स्थाई नही रहेगा । जैसे मल मूत्र का रोजाना त्याग करना पड़ता है फिर स्नान मंजन आदि क्रियाओ से शरीर को स्वच्छ रखते है उसी प्रकार मन के मलो को भी त्याग करने बाद साफ़ सुथरा रखने का अभ्यास किया जा सकता है । मै लगातार अभ्यास कर रहा हूँ आप भी करे । बहूत अच्छा महसुश होने लगेगा । अपने आप ही पवित्रता आने लगेगी । मन साफ होने लगेगा । यही अनुभव शौच है ।
                          2.संतोष
हम बार बार सुनते है "संतोषी सदा सुखी" संतोष करने वाला सदा सुखी रहता है। और हमे जीवन में क्या चाहिए । हम सब सुख के लिए ही तो भटक रहे है ।
लेकिन इसके विपरीत हमे यह भी सुनने को मिल जाता है कि "विद्यार्थियों को संतोशी नही होना चाहिए ।" कमाने वाला यदि संतोशी हो गया तो फिर हो गई कमाई । फिर कुछ लोग यह भी कहते है "संतोष का फल मीठा होता है "।
बहुत ही उलझन है । यदि समझ गए तो उलझन समाप्त , नही समझे तो उलझन ही उलझन है । चलो हम आज समझ लेते है कि संतोष क्या है और योग में इसका क्या महत्व है । योग करने से पहले इस नियम का पालन करना क्यों जरूरी है । संतोष का मतलब है हम जो है उसको जीना सीख ले । किसी की नक़ल करना या किसी और के जैसा बनने की चाह असन्तोष है और अपने जैसा बने रहना ही संतोष है ।
प्रकृति ने सभी को एक अलग रूप, स्वभाव, क्षमता प्रदान की है । हमे भी सबसे अलग बनाया है । फिर क्यों दूसरे जैसे बने । अपने आपकी क्षमता योग्यता को पहचान लेना और रोजाना इसको बढ़ाते रहना ही संतोष है ।
कहा गया है विद्यार्थी को और व्यापारी को सन्तोषी नही होना चाहिए । सही कहा है मै तो कहता हूं किसी को भी सन्तोषी नही होना चाहिए । लेकिन कब तक ? जब तक अपने आपको खुद न जान ले। जिस दिन खुद को सच में जान लेंगे उस दिन जीवन में संतोष ही संतोष होगा ।
अब जाने कैसे ? इसके लिए आगे का नियम है ।
                            3. तप
अपने आप को जानने और सक्षम बनाने का नाम ही तप है । लोग तप का नाम सुनते ही भड़क जाते है । ये तप और तपस्या नही करनी हमें ,और इसीलिए लोग योग नही करते है ।
तप से डरने की जरूरत नही है । तप के माध्यम से हम अपने आपको तैयार करते है। ये भी धीरे धीरे ही संभव हो सकेगा । जैसे यह विशेष योग्यता प्राप्त करने की पढ़ाई है । पढ़ाई करना खेल खेलना और किसी भी काम को करने में सक्षम बनाना ही तप है ।
भगवान् से जुड़ने के लिए यह एक बहुत कठिन दिखने वाला सरल नियम है । नियमित अभ्यास से मुर्ख भी विद्वान बन जाता है ।
                          4. स्वाध्याय
अपने आपको पढ़ना, अपना खुद का मूल्यांकन करना,ही स्वाध्याय है । नियमित रूप से अपने बुजुर्गो , अपने आदर्श रूप परमात्मा को अपने अंदर देखना ही स्वध्याय है ।
रोजाना कुछ समय अपने खुद के लिए निकाल कर खुद की कमियां खुद अधिकता यानि गुण और अवगुणों को जानने की कोशिश करनी चाहिए ।
मनुष्य जितना खुद अपने बारे में जानता है उतना दूसरा नही जान सकता । दुसरो द्वारा की गई प्रशंसा का सही मूल्यांकन करके अपना खुद का जीवन बिताना ही सच में स्वध्याय है।
यह नियम भी जीवन को बहुत ही आगे ले जाताहै अपने आपको जीवन में यदि आगे ले जाना है तो अपना अध्ययन अवश्य ही करे ।
                       5 ईश्वर प्रणिधान
जब खुद का ज्ञान हो जाता है तो यह आभास होने लगता है कि मेरे अंदर कोई है जो मुझे गति दे रहा है । बस उसको अपने अंदर बैठाये रखना या उसे सँजोये रखना ही ईश्वर प्रर्निधान है ।
एक ईश्वर अपने अंदर स्थापित करके उस को हमेशा जीवित रखना ही ये पांचवा नियम कहलाता है ।
इन पांचों नियमो का अभ्यास करे और अपने आपको इस परमसत्ता से मिलन के महा प्रयोजन में लगाये रखे । जब हम उस सत्ता से मिलने के काबिल हो जाएंगे तो जरूर मिलन होगा ।
अब नियम के बाद अगला योग है "आसन" । अगली पोस्ट में आसन की पूरी जानकारी , आसन के लाभ ,हानि , क्यों करे आसन , किसे नही करना चाहिए आसन आदि सभी जानकारी आप लोगो को मिलेगी पढ़ते रहे "निरोगी काया"और मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए मुझे ईमेल करे ।
                    
                       

Saturday, 26 November 2016

गाजर (carrut) - बडी गुणकारी है ।

गाजर को सब लोग जानते है । गाजर की केवल सब्जी और सलाद ही नही बनती बल्कि इससे कई प्रकार के व्यंजन भी बनाये जाते है जैसे- गाजर पाक । इसके साथ ही गाजर का उपयोग औषधि में भी लिया जाता है
गाजर में प्रोटीन , वसा, कार्बोहाइड्रेट , रेशे, खनिज तत्व, केल्सीयम, फास्फोरस, लोहा , इत्यादि पाये जाते है। इसमें विटामिन ए , बी,सी, तथा विटामिन बी समूह के थायमिन, रिबोफ्लेविन,तथा निकोटिनिक अम्ल पाये जाते है ।
आयुर्वेद ग्रंथो के अनुसार गाजर तीक्ष्ण,मधुर, कड़वी, गर्म, अग्नीसंदीपन करने वाली , हल्की ग्राही, और रक्तपित्त, बवासीर , संग्रहणी कफ तथा वात नाशक है।
रोगानुसार गाजर को इस प्रकार प्रयोग कर सकते है ।
1. ह्रदय रोग -
5-6 गाजर को अंगारो पर पकाएं या कच्ची  ही छीलकर  रात भर बाहर औंस में रख़ी रहने दें। प्रातः काल केवड़ा या गुलाब अर्क, और मिश्री मिला कर खाने से ह्रदय की धड़कन सामान्य हो जाती है।
गाजर को कद्दूकस करके दूध में उबालें । जब गाजर गल जाए , तो शक्कर मिला कर खाने से दिल को शक्ति मिलती है ।
2. पेट दर्द -
गाजर को भाप में उबाल कर उसमें 10 ग्राम रस निकालें , अब उस रस में 20 ग्राम शहद मिलाकर पीने से पेट दर्द ठीक हो जाता है ।
3. खांसी  -
गाजर स्वरस में मिश्री , काली मिर्च , मिलाकर चाटे।
4. रक्तार्श -
गाजर का रस दही की मलाई के साथ लेने से आराम मिलता है ।
5. मासिक धर्म  -
गाजर का काढ़ा बनाकर सुबह शाम कुछ दिन तक लगातार पीने से मासिक धर्म में होने वाला दर्द नही होता , और मासिक धर्म नियमित आने लगता है ।