Sunday, 5 March 2017

CHURNA (चूर्ण)


Definition

Churna is a fine powder of drug and drugs.

General Method of preparation

Drugs mentioned in the yoga are cleaned and dried properly. They are finely powdered and sieved. Where there are a number of drugs in yoga. The drugs are separately powdered and sieved. Each one of them ( powder) is weighed separately, and well mixed together. As some of the drugs contain more fibrous matter than other, this method of powdering and weighing them separately, according to the yoga, and then together , is preferred.

Churna are use in ayurvedic treatments. Many disease are cure by churna. For example that's triphala is useful in constipation and any other disease. Triphala is make by three fruit of medicine plant. Amala , haritaki , and bhibhitaka.

Many other churna use in ayurvedic treatments. That is panch sakar churna , Avipatikar churna , Ajmodadi churna, Sitopaladi churna, Pusyanug churna etc.

Dr Vedprakash Kaushik
Ayurved medical officer Rajsthan

Saturday, 4 March 2017

अम्लपित्त (Acidity) की दवा :- अविपत्तिकर चूर्ण

आजकल लगभग सभी लोगो को एसिडिटी की समस्या रहती है । मेरी प्रेक्टिस में ऐसे बहुत मरीज आते है जो इस रोग से ग्रसित रहते है । आजकल का खान पान बहुत ही खराब हो गया है । दिन भर में कुछ भी खा लेना कुछ भी पी लेना एक फ़ैसन हो गया है।

जंक फूड , चाय , कोफ़ी, तली हुई वस्तु यह सब बाजार में प्रचुर मात्रा में प्रयोग में लिया जाता है । बाजार में जाने वाले या वहां पर काम धंधा करने वाले लगभग सभी लोग इनका भरपूर मात्रा में बिना किसी भय के सेवन करते है ।और बार बार चाय पीने तथा जंक फूड जैसे आहार से अम्लपित्त (Acidity) हो जाती है ।

यदि अम्लपित्त से ग्रसित है तो निम्न लिखित चूर्ण को घर पर बनाये और नियमित रूप से सेवन करे । यदि बनाने में कोई समस्या हो तो किसी भी नजदीकी आयुर्वेद मेडिकल स्टोर से खरीद कर प्रयोग कर सकते है । यह बाजार में "अविपत्तिकर चूर्ण"  के नाम से बिकता है ।

अविपत्तिकर चूर्ण :-

द्रव्य और निर्माण विधि :-

सौंठ, कालीमिर्च, छोटी पीपल, हरड़ का दल, बहेड़ा का दल, आँवला दल, नागरमोथा, नौसादर, बायबिडंग, छोटी इलायची, और तेजपात, प्रत्येक 10-10 ग्राम।
लौंग 110 ग्राम ,निशौथ का मूल 220 ग्राम , मिश्री 440 ग्राम लेकर , सबको मिलाकर कपड़छान चूर्ण कर के रख लें । यह मिश्रण ही अविपत्तिकर चूर्ण के नाम से मिलता है ।

उपयोग एवं मात्रा  :- अम्लपित्त और परिणाम शूल में इसे सुबह शाम ठन्डे जल के साथ 3 से 5 ग्राम तक नियमित रूप से लें ।

अम्लपित्त की यह उत्तम औषधि आपके जीवन को सुखमय बना देगी।

डॉ वेदप्रकाश कौशिक
आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर राजस्थान

Wednesday, 1 March 2017

नाड़ी परीक्षा :- रोग परीक्षण की पुरानी पद्धति

मैं  26 फरवरी 2017 को भरतपुर ,राजस्थान में  "आधुनिक परिपेक्ष्य में नाड़ी निदान का महत्त्व" विषय पर आयोजित सेमीनार में भाग लेने गया था । इस सेमीनार के आयोजक "राजस्थान ह्रदय रोग चिकित्सा समिति" एवं  "आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर राजस्थान" (अमोर) थे। यह सेमीनार पूर्ण रूप से स्वतन्त्र सम्भासा थी इसमें राजकीय अनुदान प्राप्त नही हुआ था इसलिए भी यह ज्यादा महत्वपूर्ण थी । क्योंकि राजस्थान में इस प्रकार की यह शायद पहली ही सम्भासा (सेमीनार) थी ।

इस सेमिनार में नया अहसास हुआ। बहुत ही नयापन देखने को मिला । हालांकि विषय पूराना था । जो क़ि लगभग लुप्त हो चुका है । कोई भी आयुर्वेद चिकित्सक आजकल इस रोग परिक्षण की विधा को रोग परिक्षण में प्रयोग नही करते है । हालांकि हाथ लगाकर ये जरूर देख लेते है कि नाड़ी (puls) चल रही है या नही । इसके अलावा इस  विधा का जो महत्वपूर्ण पार्ट है उसकी तरफ किसी किसी आयुर्वेद चिकित्सक का ही ध्यान जाता होगा अमूमन यह पद्धति लुप्त हो चुकी है ।पहले ज़माने में जरूर कई लोग "नाडिया वैद्य" के नाम से जाने जाते थे । आजकल यह सब चलन में नही है ।

राजस्थान हृदय रोग चिकित्सा समिती के अध्यक्ष डॉ चंद्रप्रकाश दीक्षित ने इस विषय पर एक पुस्तिका लिख़ी है और गहन अध्ययन करने के बाद यह सेमीनार आयोजित करवाई जोकि बहुत ही अच्छा कार्य है ।

इस सेमिनार की दो ख़ास बाते रही एक तो यह क़ि यह विषय पुराना था , और दूसरी बात यह थी क़ि इस विषय पर भाग लेने वाले आयुर्वेद जगत के वे लोग थे जो आयुर्वेद की पुरानी विधाओं (जैसे अग्निकर्म, जलोका, पंचकर्म , नाड़ी परीक्षा)  को जन सामान्य तक लाने के लिए नये और  सृजनात्मक  तरीके से आयुर्वेद का प्रचार करना चाहते है जिनको डॉ विमलेश विनोद कटारा ने "अमोर" नाम दिया है ।

नये और पुराने का यह मेल मुझे बहुत ही अच्छा लगा ।क्योकि जब सामने से कोई चमकदार रोशनी आती है तो उस रोशनी से आँखे चौंधिया जाती है । जोकि आजकल आयुर्वेद के साथ हो रहा है सब कुछ आधुनिक होता जा रहा है कुछ भी दिखाई नही दे रहा है आयुर्वेद किस ओर जा रहा है और चौन्धियाये हुए आँखों को मिचमिचाते हुए आयुर्वेद विशेषज्ञ कहा चले जा रहे है । कुछ भी समझ में नही आ रहा है । सरकार भी आयुर्वेद के आधुनिकीकरण के नाम पर वेलनेश सेंटर खोल कर आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर्स से आधुनिक चिकित्सा करवाने लगी है ।ऐसा लगने लगा है कि आधुनिकता के नाम पर आयुर्वेद को और  आयुर्वेद की वास्तविक आत्मा को समाप्त किया  जा रहा है । आयुर्वेद को हर्बल नाम देकर भी आधुनिक बनाया जा रहा है ।

आयुर्वेद की रोग निदान (डायग्नोस) पद्धति तो लगभग चिकित्सक भूल चुके है । रोगों का नाम भी अब वात पित्त कफ जनित न होकर मॉडर्न पद्धति के अनुसार होते जा रहे है । ये सब जरूरी भी है क्योंकि जिंदगी की दौड़ में यदि कदम मिलाकर चलना है तो गति को तेज रखना ही पड़ता है । लेकिन अपनी संस्कृति को भूल कर दुसरो की संस्कृति अपना लेना बुद्धिमानी नही हो सकती । अपनी विधा को सदैव जिंवंत रखना हमारा कर्तव्य है । सामने से आने वाली रोशनी आँखों को बाधित करती है। लेकिन जब वही रोशनी पीछे से आये तो रास्ता साफ साफ दिखाई देने लगता है ।

इस सेमिनार में दो प्रबुद्ध विद्वानों के व्याख्यान भी सुनने को मिले जो बहुत ही सारयुक्त और प्रेरित करने वाले थे ये महान हस्ती थे एक आयुर्वेद जगत के महान लेखक डॉ बनवारी लाल गौड़ और दूसरे आई .एफ .ओ. श्री दीप नारायण पांडे । श्री पांडे जी की कही हुई कुछ बातों ने भी मुझे आत्म चिंतन के लिए मजबूर कर दिया । सभी उपस्थित अमोर्स से एक बात कही क़ि आयुर्वेद चिकित्सको के परिवारों में केंसर, डाइबिटीज, बी पी , मानसिक रोग और मोटापा ये पांच प्रकार के  रोग होने ही नही चाहिए । परिवारों के अलावा सगे संबंधियों को भी इन रोगों से बचा के रखना आप लोगो का कर्तव्य  है । क्योंकि आप लोगो का पहला उद्दयेश्य "स्वस्थयस्य स्वास्थ्य रक्षणम" है । सिर्फ आयुर्वेद ही वो चिकित्सा पद्धति है जो सबको स्वस्थ रखने की क्षमता रखती हैं। उनके विचारों से लगा कि जनता जनार्दन को हमसे कितनी अपेक्षाएं है और हम भाग रहे है मॉडर्न साइंस की ओर ।

डॉ दीक्षित के नाड़ी निदान का आधुनिक परिपेक्ष्य में क्या महत्त्व है इस विषय पर दिए गए व्याख्यान सुनकर शास्त्रोक्त ज्ञान का महत्त्व समझ में आया ।

डॉ चंद्रप्रकाश दीक्षित की लिखी पुस्तक "आयुर्वेदीय निदान की अनूठी पद्धति :- नाड़ी परीक्षा" का विमोचन भी किया गया । जिसमे उन्होने आयुर्वेद की संहिताओं और निघंटुओ में से नाड़ी के बारे में लिखी व्याख्याओं को बहुत सरल तरीके से लिखा है। आयुर्वेद चिकित्सको के लिए यह लघु पुस्तक बहुत ही कारगर साबित हो सकती है । नाड़ी परीक्षा के सम्बन्ध में योग रत्नाकर में लिखा है :-
"रोगाक्रान्तस्य शरीरस्य स्थानान्यष्टौ परिक्षयेत ।
नाड़ी मुत्रं  मलं जिव्हा शब्दम स्पर्श दर्गाकृती ।।"
इस अष्टविद परीक्षा में नाड़ी परीक्षा को प्रथम स्थान पर रखा है ।

नाड़ी परीक्षा की इस सेमिनार के बहाने से पुरानी आयुर्वेद की धरोहरो को जनसामान्य के लिए सामने लाने की यह पहल आयुर्वेद चिकित्सको के लिए पीछे  से आती, रास्ता दिखाती रोशनी के समान है । अंधेरो से घिरे रास्ते में लोगो की वांछित अपेक्षाओं को पूर्ण करने लिए का हम सबको मिलकर इसका स्वागत करना चाहिए । और इस प्रकार की स्वतन्त्र सम्भासाओ का आयोजन करते रहना चाहिए ।

डॉ वेदप्रकाश कौशिक
आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर राजस्थान

Wednesday, 22 February 2017

पारद :- जीवन का रस है ।

पारद ने बहुत ही प्रभावित किया था । पारद की उत्पत्ति की कथा पढ़कर मैं बहुत ही आश्चर्य चकित हुआ । हमे रस शास्त्र पढ़ाने वाले हमारे गुरू जी वैद्य श्री आंगिरस जी ने जब यह कथा बताई तो विश्वास ही नही हुआ ।लेकिन हो सकता है सत्य हो । अभी भी पूरा विश्वास तो नही होता लेकिन बात में कुछ तो तथ्य जरूर है। लगता है यह पारद ही जीवन का रस है । ये पुराणों में लिखी कथाएं कभी कभी  अविश्वसनीय सी लगती है लेकिन  इन में बड़ा ही सार भरा रहता है ।


आयुर्वेद ग्रंथो में पारद को बहुत ही महत्वपूर्ण औषधि बताई गई है । पारद के मिश्रण से बहुत दवाओं का निर्माण होता है । आयुर्वेद में जितने भी रस नाम से जो औषधियां है वे सभी पारद से ही बनी है । जैसे - रस सिंदूर, त्रिभुवन कीर्ति रस , लक्ष्मी विलास रस, कामदुधा रस, आदि ।

पारद को सामान्यत पारा भी कहा जाता है । इसके पांच भेद है - रस , रसेन्द्र, सूत, पारद ,और मिश्रक । इसको भगवान् शिव जी का वीर्य माना जाता है।

पारदो रस धातुश्च रसेन्द्रश्च महारसः ।
चपलः शिववीर्यश्च रसः सूतः शिवाहण्यः।।
रसेन्द्रः पारदः सूतः हरजः सुतको रसः ।
मिश्रकश्चेति नामानि ज्ञेयानि रस कर्मसु ।।

इन भेद की चर्चा के साथ उत्पत्ति की रोचक कहानी भी जानना बहुत जरूरी है । कथा कुछ इस प्रकार है ।

Saturday, 11 February 2017

मूली (Raddish)


मूली का कन्द गाजर के समान, परंतु सफेद होता है । पत्ते नवीन सरसो के पते के समान, फूल सफेद,सरसो के फूलो के आकार के और फल भी सरसो के समान ही होते है। उन्हें "सोगरी" कहते है । बीज सरसो से बड़े होते है ।
बीजो में उड़नशील तैल होता है ।कन्द में आर्सेनिक 0.1मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम में रहता है।
मूली भूख बढ़ाने , पेट के कीड़े नष्ट करने वाली, पाईल्स, और सभी प्रकार की सूजन को ठीक करने में उपयोगी है ।
आयुर्वेद के अनुसार कच्ची मूली कटु, तिक्त, उष्ण, रुचिकारक, पाचन, मधुर, बल्य, तथा मूत्र विकार, अर्श, क्षय, श्वास, कास, नेत्ररोग, एवं वात,पित्त, कफ,और रक्त विकारो को दूर करती है ।
पुरानी मूली चरपरी, गरम, अग्निवर्धक, होती है ।
मूली की फली सोगरी किंचित गरम और किंचित कफ और वात नाशक होती है ।
मूली - सब्जी, सलाद, के साथ साथ आयुर्वेद चिकित्सा में भी उपयोगी है । इसको अलग अलग प्रकार से प्रयोग कर रोगों का उपचार भी किया जा सकता है ।
आयुर्वेद चिकित्सा में मूली को रोगानुसार इस प्रकार प्रयोग किया जाता है ---
कामला रोग
मूली के ताजे पत्तो को जल के साथ पीसकर उबाल ले , दूध की भांति झाग ऊपर आ जाता है इसको छान कर दिन में तीन बार पीने से कामला रोग मिटता है ।
पीलिया में मूली की सब्जी खानी चाहिए ।
यकृत प्लीहा रोग
मूली की चार फांक कर के छः ग्राम पिसा नौसादर छिड़क कर रात को ओस में रख कर सुबह जो पानी निकले उसको पीकर ऊपर से मूली की फांक खाने से फायदा होता है ।
पथरी
मूली के पत्तो को 10 ग्राम रस में अजमोद मिलाकर पीना चाहिए । पथरी पिघल जाती है ।
बवासीर
मूली के पत्तो को छाया में सुखा कर पीसकर समान मात्रा में शक्कर मिलाकर 40 दिन तक 25 से 50 ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए ।
मासिक धर्म
मूली के बीजों के चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में देने से मासिक धर्म की रूकावट दूर होती है । गर्भवती महिला को मूली के बीजो का सेवन नही करना चाहिए । वरना गर्भपात होने की संभावना हो सकती है ।
दाद
मूली के बीजो को नींबू में पीसकर लगाने से दाद में लाभ होता है ।
इंद्रिय शैथिल्य
किसी किसी व्यक्ति को इंद्रिय शैथिल्य ( शिश्न में उत्तेजना न होना) रोग हो जाता है ।इस रोग में यदि मूली के बीजो को तेल में औटाकर उस तेल की कामेन्द्रिय(शिश्न)  पर मालिश की जाये तो शिथिलता समाप्त हो जाती है और उत्तेजना पैदा होती है ।
इस प्रकार साधारण सी दिखनी वाली मूली हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है । इसलिए मूली का सेवन अवश्य ही करना चाहिए ।

Friday, 10 February 2017

रस सिंदूर : धातु वृद्धि (Sex power) में है उपयोगी ।

आज हम एक बहुत ही महत्वपूर्ण औषधि की बात कर रहे है , जिसका नाम है रस सिंदूर । यह एक कुपिपक्व रसायन औषधि है । यह औषधि शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक के मिश्रण से कुपिपक्व विधि से तैयार की जाती है ।

यह औषधि बहूत ही उत्तम रसायन है । यह गुण धर्म के हिसाब से उष्ण वीर्य है । पारद और गंधक का यह कल्प शरीर के अंगों की क्रिया को बढ़ाता है । अनुपान भेद से अनेक रोगों को इसका मिश्रण नाश करता है । यह कफ प्रधान रोगों की उत्तम दवा है ।

यह उष्ण होने के कारण पित्त प्रधान रोगों में स्वतन्त्र रूप से प्रयोग में नही लिया  जाता है यदि पित्त शामक औषधि जैसे प्रवाल पिष्टी, कामदूधा रस, गिलोय सत्व आदि किसी भी औषधि को मिला कर दे तो पित्त प्रधान रोगों में भी अच्छा फल प्राप्त किया जा सकता है ।

कफ प्रधान सन्निपात , न्यूमोनिया, इन्फ्लूएंजा, श्वास रोग, पुराना कफज कास, आदि रोगों में कफ संचित होकर रोग बढ़ते जाते हो, साथ ही दूषित कफ होने के कारण इनके उपद्रव भी बढ़ते जाते हो, तो ऐसे समय में रस सिंदूर बहुत ही अच्छा काम करता है ।

सुखी खांसी में रस सिंदूर अकेले न देकर प्रवाल भस्म या पिष्टी के साथ सितोपलादि चूर्ण , च्यवनप्राश के साथ देने से लाभ होता है ।

रोगानुसार उपयोग :-

नवज्वर (Instant fever) में रस सिंदूर गोदन्ती हरताल भस्म के साथ मिला कर तुलसी पत्र स्वरस से देने से लाभ मिलता है ।

जीर्ण ज्वर (Chronic fever) में रस सिंदूर , पित्त पापड़ा, धनिया, और गिलोय का क्वाथ (काढ़ा) बना कर शहद मिला कर पिने से लाभ मिलता है ।

अर्श (Piles) रस सिंदूर को छोटी हरड़ के साथ देने से आराम मिलता है।

श्वास ( Asthama) में रस सिंदूर और विभीतक चूर्ण का मिश्रण लाभ करता है ।

कामला में रस सिंदूर , स्वर्ण माक्षिक भस्म, और कसीस भस्म को मिलाकर देने से लाभ मिलता है ।

और भी बहुत से रोग है जिनमे रस सिंदूर किसी अन्य दवा के मिश्रण से बहुत ही अच्छा लाभ करती है ।

निम्न  प्रमुख रोग है जिनमे यह काम करती हैं।

पांडु, अजीर्ण, उदरशूल, मूर्च्छा, सर्वांग शौथ, अपस्मार, भगंदर, गुल्म आदि रोगों में भी अन्य औषधि के मिश्रण से यह दवा उत्तम कार्य करती है

इनके अलावा शरीर को बलवान बनाने, धातु वृद्धि  के लिए , वाजीकरण के लिए, स्वप्न दोष को दूर करने आदि के लिए भी यह औषधि बहुत ही कामयाब है ।

धातु वृद्धि के लिए :- यह धातु को बढ़ाने के लिए , वीर्य को गाढ़ा करने के लिए , शीघ्र पतन और स्वप्न दोष की बहुत ही उत्तम दवा है । निम्न लिखित मिश्रण बना कर अपना जीवन उत्तम बनाये ।

1. रस सिंदूर 1 रत्ती
    बंग भस्म 1 रत्ती
    स्वर्ण भस्म 1/4रत्ती
     मलाई के साथ

2.   या लौंग, केशर , जावित्री, अकरकरा, पीपल, प्रत्येक 1 -1 भाग तथा कपूर, भांग, अफीम, और नाग भस्म, आधा आधा भाग लेकर, सबका यथा विधि चूर्ण बनावे। एक माशा इस चूर्ण के साथ 1 रत्ती की मात्रा में रस सिंदूर लेना चाहिए ।

इसका प्रयोग किसी योग्य चिकित्सक के परामर्श से ही करना चाहिए ।

Monday, 30 January 2017

श्री धनवंतरी चालीसा

                         
                              दोहा

करूं वंदना गुरू चरण रज, ह्रदय राखी श्री राम ।
मातृ पितृ चरण नमन करूँ, प्रभु कीर्ति करूँ बखान ।।1

तव कीर्ति आदि अनंत है , विष्णुअवतार भिषक महान।
हृदय में आकर विराजिए,जय धन्वंतरि भगवान ।।2।।

             चौपाई

जय धनवंतरि जय रोगारी ।
सुनलो प्रभु तुम अरज हमारी।।1।।

तुम्हारी महिमा सब जन गावें ।
सकल साधुजन हिय हरषावे।।2।।


शाश्वत है आयुर्वेद विज्ञाना ।
तुम्हरी कृपा से सब जग जाना ।।3।।

कथा अनोखी सुनी प्रकाशा ।
वेदों में ज्यूँ लिखी ऋषि व्यासा ।।4।।

कुपित भयऊ तब ऋषि दुर्वासा ।
दीन्हा सब देवन को श्रापा ।।5।।

श्री हीन भये सब तबहि  ।
दर दर भटके हुए दरिद्र हि ।।6।।

सकल मिलत गए ब्रह्मा लोका ।
ब्रह्म विलोकत भयेहुँ अशोका ।।7।।

परम पिता ने युक्ति विचारी ।
सकल समीप गए त्रिपुरारी ।।8।।

उमापति संग सकल पधारे ।
रमा पति के चरण पखारे ।।9।।

आपकी माया आप ही जाने ।
सकल बद्धकर खड़े पयाने।।10।।

इक उपाय है आप हि बोले ।
सकल औषध सिंधु में घोंले ।।11।।

क्षीर सिंधु में औषध डारी ।
तनिक हंसे प्रभु लीला धारी ।।12।।

मंदराचल की मथानी बनाई ।
दानवो से अगुवाई कराई ।।13।।

देव जनो को पीछे लगाया ।
तल पृष्ठ को स्वयं हाथ लगाया ।।14।।

मंथन हुआ भयंकर भारी ।
तब जन्मे प्रभु लीलाधारी ।।15।।

अंश अवतार तब आप ही लीन्हा ।
धनवंतरि तेहि नामहि दीन्हा ।।16।।

सौम्य चतुर्भुज रूप बनाया ।
स्तवन सब देवों ने गाया ।।17।।

अमृत कलश लिए एक भुजा ।
आयुर्वेद औषध कर दूजा ।।18।।

जन्म कथा है बड़ी निराली ।
सिंधु में उपजे घृत ज्यों मथानी ।।19।।

सकल देवन को दीन्ही कान्ति ।
अमर वैभव से मिटी अशांति ।।20।।

कल्पवृक्ष के आप है सहोदर ।
जीव जंतु के आप है सहचर ।।21।।

तुम्हरी कृपा से आरोग्य पावा ।
सुदृढ़ वपु अरु  ज्ञान बढ़ावा ।।22।।

देव भिषक अश्विनी कुमारा ।
स्तुति करत सब भिषक परिवारा ।।23।।

धर्म अर्थ काम अरु मोक्षा ।
आरोग्य है सर्वोत्तम शिक्षा ।।24।।

तुम्हरी कृपा से धन्व राजा ।
बना तपस्वी नर भू राजा ।।25।।

तनय बन धन्व घर आये ।
अब्ज रूप धनवंतरि कहलाये ।।26।।

सकल ज्ञान कौशिक ऋषि पाये ।
कौशिक पौत्र सुश्रुत कहलाये ।।27।।

आठ अंग में किया विभाजन ।
विविध रूप में गावें  सज्जन ।।28।।

अथर्ववेद से विग्रह कीन्हा ।
आयुर्वेद नाम तेहि दीन्हा ।।29।।

काय ,बाल, ग्रह, उर्ध्वांग चिकित्सा ।
शल्य, जरा, दृष्ट्र, वाजी सा ।।30।।

माधव निदान, चरक चिकित्सा ।
कश्यप बाल , शल्य सुश्रुता ।।31।।

जय अष्टांग जय चरक संहिता ।
जय माधव जय सुश्रुत संहिता ।।32।।

आप है सब रोगों के शत्रु ।
उदर नेत्र मष्तिक अरु जत्रु।।33।।

सकल औषध में है व्यापी ।
भिषक मित्र आतुर के साथी ।।34।।

विश्वामित्र ब्रह्म ऋषि ज्ञानि।
सकल औषध ज्ञान बखानि ।।35।।

भारद्वाज ऋषि ने भी गाया  ।
सकल ज्ञान शिष्यों को सुनाया।।36।।

काय चिकित्सा बनी एक शाखा ।
जग में फहरी शल्य पताका ।।37।।

कौशिक कुल में जन्मा दासा ।
भिषकवर नाम वेद प्रकाशा ।।38।।

धन्वंतरि का लिखा चालीसा ।
नित्य गावे होवे वाजी सा ।।39।।

जो कोई इसको नित्य ध्यावे ।
बल वैभव सम्पन्न तन पावें ।।40।।

                                दोहा

रोग शोक सन्ताप हरण, अमृत कलश लिए हाथ  ।
ज़रा व्याधि मद लोभ मोह , हरण करो भिषक नाथ ।।
         ।।।इति श्री धन्वंतरि चालीसा।।।