Thursday, 7 December 2017
Monday, 13 November 2017
हल्दी (Turmeric )
परिचय
रसोई घर में प्रयोग होने वाले मशालों में हल्दी अपना विशिष्ट स्थान रखती है ।यह कन्द रूप में पाई जाती है । जीवन में इसका बहुत ही उपयोग बताया गया है । हल्दी के बिना कोई भी मांगलिक कार्य नहीं होते है । हिन्दू धर्म में हल्दी को शादी विवाह में बहुत ही महत्व दिया जाता है । कई कार्यक्रम तो हल्दी के नाम से ही जाने जाते है जैसे हल्दी बान ।
सौंदर्य प्रसाधनो में भी इसका प्रयोग किया जाता है । उबटन बनाने , फेस पैक बनाने आदि में यह प्रयोग की जाती है ।
मशाले के अलावा कच्ची हल्दी की सब्जी भी बनाई जाती है । जब तेज सर्दी पड़ती है तब मारवाड़ राजस्थान में हल्दी की गोठ बहुत ही फेमस रहती है । जिसमे हल्दी की सब्जी और मक्की की रोटी का संयोग बहुत ही आनन्द प्रदान करने वाला होता हैं ।
हल्दी की कई प्रकार की होती है जिनमे चार प्रकार की हल्दी अलग अलग नाम और काम से जानी जाती है ।
1 सामान्य हल्दी :- यह हल्दी मशाले के रूप में काम में आती है जोकि प्रत्येक घर में मिल जाती है ।
2 आमाहल्दी :- इसके कंद और पत्तो में कपुर मिश्रित आम की खुश्बू आती है । इसलिए इसे आमाहल्दी ( mango ginger) कहते है ।
3. जंगली हल्दी :- यह बंगाल में पाई जाती है । यह रँगने के काम आती है ।
4 दारुहल्दी :- यह सामान्य हल्दी के समान गुण वाली होती है । इसके क्वाथ में बराबर का दूध डालकर पकाते है । जब वह चतुर्थांश रहकर गाढ़ा हो जाता है तब उसे उतार लेते है । इसी को रसांजन या रसौत कहते है । यह नेत्रो के लिए परम हितकारी है ।
आयुर्वेदीय उपयोग :-
आयुर्वेद के ग्रन्थों के अनुसार यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण औषधी है । यह उष्ण वीर्य होती है । जिसके कारण यह कफवात शामक , पित्त रेचक, तथा वेदना स्थापन है ।
प्रमेह के लिए यह श्रेठ दवा है ।
यह रूचि वर्धक एवं रक्त स्तंभक है ।
इसका प्रयोग रक्त विकार , कफ विकार, अतिसार, जुखाम, डाइबिटीज, और चर्मरोग में भी किया जाता है ।
Wednesday, 4 October 2017
डर ( FEAR ) लगना क्या कोई रोग है ?
गलत काम करने से अपने आपको बचाना चाहिए ।
सत्संग को बढ़ाना चाहिए ।
प्रकृति और परमात्मा पर भरोसा रखना चाहिए ।
Saturday, 30 September 2017
पाईल्स की दवा :- अगस्त्य हरीतकी
परिचय :-
यह हरड़ के द्वारा बनाई गई एक बहुत ही महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औषधि है । जैसा कि हम जानते है हरड़ शरीर में कभी भी कोई साइड इफेक्ट नही करता है और जो शरीर में विजातीय द्रव्य (कीटोन बॉडी) होते है उन्हें बाहर निकाल कर शरीर के प्रत्येक अंग की क्रियाशीलता को व्यवस्थित करता है।
औषध द्रव्य :-
(1)मुख्य द्रव्य :-
बड़ी हरड़ 100 नग, जौ चार सेर, दशमूल सवा सेर, चित्रक, पिपला मूल, अपामार्ग, कपूर, कौंच के बीज, शंख पुष्पी, भारंगी, गज पीपल, खरैटी और पुष्कर मूल, प्रत्येक 10 - 10 तोला,
(2)अन्य द्रव्य :-
घृत 40 तोला, तेल 40 तोला, गुड़ सवा छः सेर ।
(3) प्रक्षेप द्रव्य :-
मधु 40 तोला, पिपली चूर्ण 20 तोला ।
बनाने की विधि :-
अगस्त्य हरीतकी नाम से यह दवा बाजार में आयुर्वेदिक स्टोर्स पर आराम से मिल जाती है । फिर भी जिन लोगो को घर पर ही यह दवा बनानी हो तो उनके लिए यह विधि शास्त्रों में बताई गई है ।
बड़ी हरड़ (हरीतकी) और जौ को एक पोटली में बांधे, और बाक़ी द्रव्यों को मिलाकर अधकुटा करके एक मन(लगभग 40 लीटर) पानी में पकावे, तथा इसी में उक्त पोटली रख दें ।
जब हरड़ और जौ उबल जाये तथा क्वाथ तैयार हो जाए तो उतार ले । इस क्वाथ को छान कर इसमें उबाली हुई हरीतकी को मिलावे । फिर इसमें घृत और तेल 40-40 तोला तथा गुड़ सवा सेर पकावें ।
अवलेह सिद्ध होने पर या ठंडा होने पर मधु (शहद) 40 तोला और पिपली चूर्ण 20 तोला मिलाकर सुरक्षित रख लें ।
गुण और उपयोग :-
इसके सेवन से पाईल्स(अर्श), दमा(अस्थमा), क्षय(टी बी), खांसी, ज्वर, अरुचि, आदि रोगों का नाश करती है । कफ का नाश करने वाली होने के कारण दमा, खांसी, श्वास, यक्ष्मा,आदि में बहुत लाभ करती है ।
पाईल्स में है विशेष उपयोगी :-
अगस्त्य हरीतकी मृदु विरेचक है , इसलिए अर्श (बवासीर, पाईल्स) वाले को विशेष लाभ करती है । पाईल्स रोग अमूमन कब्ज होने से होता है और अगस्त्य हरीतकी विरेचक औषधि है यह कब्ज को दूर कर देती है । यदि ज्यादा कब्ज हो तो गर्म जल के साथ सेवन करने से एक दो दस्त साफ़ हो जाते है । इससे न तो पेट में मरोड़ होती है और न ही किसी प्रकार की तकलीफ होती है । अधिक दिनों तक इसका सेवन करने से किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ और साइड इफेक्ट नही होते है । इसका सेवन लगभग दो से तीन माह तक करना चाहिए । यह अपना पूर्ण असर लगातार लम्बे समय तक लेने से ही स्थाई दिखा पाती है ।
सावधानियां :-
यह बहुत ही अच्छी और महत्वपूर्ण औषधि है और इसका कोई भी साइड इफेक्ट नही होता है , फिर भी यदि कोई अन्य रोग से ग्रसित व्यक्ति यह दवा लेता है तो उसे अपने चिकित्सक से परामर्श लेकर ही यह दवा लेनी चाहिए ।
Sunday, 24 September 2017
Ayurvedic kadha आयुर्वेदिक काढ़ा
दस मूल क्वाथ
जन्म घुट्टी क्वाथ
त्रिफलादि क्वाथ
धान्य पंचक क्वाथ
पथ्यादि क्वाथ
मधुकादि हिम क्वाथ
Thursday, 7 September 2017
हितकर आहार और अहितकर आहार
कोई के बैंगन बादी करीं, कोई के बैंगन पथ्य।।"
2 मुंग
3 आकाशीय जल
4 सैंधा नमक
5 जीवन्ति पत्र शाक
6 ऐनेय मृग मांस
7 लाव पक्षी का मांस
8 गोह का मन
9 रोहित मछली का मांस
10 गाय का घी
11 गाय का दूध
12 तिल का तैल
13 सूअर की चर्बी
14 चुलुकी मछली की चर्बी
15 पाक हंस की चर्बी
16 मुर्गे की चर्बी
17 बकरे की मेद
18 अदरक
19 मुनक्का
20 शर्करा
ये बीस आहार द्रव्य प्रकृति से ही हितकारी होते है ।
2 उड़द
3 वर्षा में नदी का पानी
4 औसर नमक
5 सरसो की सब्जी
6 गाय का मांस
7 काण कबूतर का माँस
8 मेंढक का माँस
9 चिलचिम मछली का माँस
10 भेड़ का घी
11 भेड का दूध
12 कौशुम्भी का तैल
13 भैस की चर्बी
14 चटक पक्षी का मांस
15 कौवे की चर्बी
16 चटक पक्षी की चर्बी
17 हाथी की चर्बी
18 आलू
19 लकुच
20 गन्ने की राब
हितकर आहार और अहितकर आहार
क्या है ? हितकर और अहितकर आहार ।
जो आहार समूह शरीरस्थ समधातुओ को प्रकृति में रखता है , अर्थात जो आहार समधातुओ को कम या ज्यादा नही होने देता और विषम ( घटे या बढ़े )धातुओं को सम कर देता है उसी को हित कारक आहार समझना चाहिए और इसके विपरीत कार्य करने वाले आहार को अहित कारक समझना चाहिए ।
आहार क्या है ?
"आह्रीयते (पोषणार्थं) इति आहारः" शरीर के पोषण के लिए जो द्रव्य( ठोस,द्रव) लिया जाये , वह आहार है ।
यह आहार छः रसों से युक्त प्राणियों के प्राणों की रक्षा करने वाला होता है । बल , वर्ण, औज आदि की वृद्वि करता है । शरीर को पृष्ठ और सौष्ठव युक्त बनाता है । लेकिन कई बार यही आहार प्राणियों के प्राण भी हर लेता है और संकट भी पैदा कर देता है । इसलिए सोच समझ कर ही आहार का सेवन करना चाहिए ।
क्या खाएं ? इस पर विचार करें ।
राजस्थानी में एक कहावत है "ऊंट छोड़े आक और बकरी छोड़े ढाक" यानि जी रेगिस्थान का जहाज ऊंट है वह सब कुछ आहार को पचा जाता है लेकिन उसको भी एक आक नामक पौधे को छोड़ना पड़ता है क्योंकि वह उसके लिए अहित कारक है उसी प्रकार बकरी के लिए ढाक अहित कारक आहार है ।
इसी प्रकार मनुष्य शरीर में भी बहुत से आहार हितकारक होते है और कुछ आहार द्रव्य अहितकर भी होते है । किसी किसी आहार के संस्कार से उसे हितकर भी बनाया जा सकता है लेकिन कुछ आहार तो ऐसे होते है कि उनकी प्रकृति ही अहितकारी होती है ।
आहारो का विभाजन :-
सभी आहारों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है ।
1 स्थावर आहार :- जैसे गेहूं, चावल, जौ , चना , साग- सब्जी , शुक धान्य, शमी धान्य आदि ।
2 जंगम आहार :- पशु पक्षियों का मांस।
कौनसे आहार हितकारी है ?
इस संदर्भ में एक बात सही लगती है कि
"कोई के बैंगन वायरा,कोई के बैंगन पच।
कोई के बैंगन बादी करीं, कोई के बैंगन पथ्य।।"
किसी के बैंगन वायुकारक होते है किसी को बैगन हितकारी होते है । तो यह एक अजीब सी विडंबना है कि क्या किया जाये । इसी समस्या का आभास महर्षि अग्निवेश को भी था कि यह समस्या हो सकती है इसलिए उन्होंने बहुत ही सुन्दर तरीके से शौध करके कुछ आहार द्रव्यों की सूचि बनाई जो प्रकृति से ही हितकारी है उनका स्वभाव ही ऐसा है कि उन्हें कोई भी किसी भी तरीके से खाये वे शारीर में हमेशा हितकारी ही कार्य करेंगी ।
एक सूचि ऐसी भी बनाई की उनको आप कैसे भी खाए वे शारीर को अहित ही पहुचायेंगी । उनका स्वभाविक गुण अहितकारी ही है ।
पहले हितकारी आहार की बात करते है , जो प्राकृत रूप से शरीर में सभी दोषो को सम अवस्था में रखने का ही कार्य करते है इस प्रकार के आहार द्रव्यों की एक सूची इस प्रकार है ।
ये आहार द्रव्य प्रकृति से ही हितकारी होते है , ये किसी भी प्रकार से अहितकारी नही होते है ।
1 लाल शाली चावल
2 मुंग
3 आकाशीय जल
4 सैंधा नमक
5 जीवन्ति पत्र शाक
6 ऐनेय मृग मांस
7 लाव पक्षी का मांस
8 गोह का मन
9 रोहित मछली का मांस
10 गाय का घी
11 गाय का दूध
12 तिल का तैल
13 सूअर की चर्बी
14 चुलुकी मछली की चर्बी
15 पाक हंस की चर्बी
16 मुर्गे की चर्बी
17 बकरे की मेद
18 अदरक
19 मुनक्का
20 शर्करा
ये बीस आहार द्रव्य प्रकृति से ही हितकारी होते है ।
अहितकारक आहार कौनसे है ??
जो शरीर को हर हालत में हानि पहुचाये उनका स्वाभाविक गुण ही ऐसा हो , उनको प्रकृति ने ही इस प्रकार का बनाया है उन आहार द्रव्यों की सूचि महर्षि अग्निवेश इस प्रकार बनाई है ।
1 जौ
2 उड़द
3 वर्षा में नदी का पानी
4 औसर नमक
5 सरसो की सब्जी
6 गाय का मांस
7 काण कबूतर का माँस
8 मेंढक का माँस
9 चिलचिम मछली का माँस
10 भेड़ का घी
11 भेड का दूध
12 कौशुम्भी का तैल
13 भैस की चर्बी
14 चटक पक्षी का मांस
15 कौवे की चर्बी
16 चटक पक्षी की चर्बी
17 हाथी की चर्बी
18 आलू
19 लकुच
20 गन्ने की राब
इन दोनों सूचियों में अनाज, फल ,पशु ,पक्षी ,बिल में रहने वाले जीव, जल में रहने वाले जीव,कन्द, मूल , घी , दूध, आदि सभी प्रकार के आहार द्रव्यों का विवेचन किया गया है ।
हजारो वर्ष पहले लिखे गए आयुर्वेद ग्रंथो में आज भी यथावत काम आने वाली बाते लिखी गई है । इन सभी बातों को आम पब्लिक पहुचाने के लिए ही यह लेख लिखा गया है । जब यह लेख लिखने से पहले जब मैं इस संदर्भ में पढ़ रहा था तब कुछ लोगो से मैंने यह जिक्र किया था कि लोग गाय का मांस क्यों खाते है यह तो अहितकारी होता है तब एक बन्धु ने सुश्रुत संहिता का उल्लेख करते हुए लिखा था कि गाय के मांस वीर्य वर्धक और पुष्टिकारक होता है । उस वक्त मैंने उन महोदय को यह जबाव दिया था कि मदिरा भी हर्ष और आनन्द उत्पन्न करने वाली होती है । लेकिन क्या सच में वह ऐसा करने वाली है । शराब का स्वाभाविक गुण शरीर को नुकसान पहुचाना ही है ।
इन द्रव्यों में भी बहुत गुण भी है लेकिन जो स्वभाविक गुण बताया गया है वह हितकारी और अहितकारी के दृष्टिकोण से बताया गया है । इति

