Sunday, 30 July 2017

सिरदर्द या शिरः शूल (HEAD ACHE)

क्या होता है सिरदर्द ?

किसी भी रोग में वह रोग संक्रामक हो या दोषज, उनमे सिर दर्द एक सामान्य और महत्वपूर्ण लक्षण के रूप में दिखने वाला रोग है । कोमल प्रकृति के मनुष्य में शारीर में होने वाली किसी भी प्रकार की विकृति से यह रोग उत्पन्न हो सकता है। किसी किसी को हल्का तनाव होने पर भी यह रोग आक्रांत कर लेता है । रक्तदाब के बढ़ने या घटने से माथे (fore head) पर होने वाली तीव्र पीड़ा को सिरदर्द कहते है ।

क्या कारण होते है ?

प्राणाः प्राण भृतां यत्र श्रिताः सर्वेंद्रियानी च ।
यदुत्तमं$मगानां     शिरः तद्भिधीयते ।। च.सु.

जिसमे प्राणियों के प्राण आश्रित रहते है , सभी ज्ञानेन्द्रियाँ जहाँ रहती है और जो शरीर के सभी अंगों में उत्तम अंग है वही शिर कहलाता है ।

इसमें कोई भी रोग की उत्त्पति हो वह सामान्य सी हो या बड़ी हो तो यह एक प्रकार से संकेत देने लगता है । इसमें कुछ गड़बड़ी का अहसास दिलाने की क्षमता प्राकृतिक रूप  से है और यही कारण है जब विकृति होती है तो यह गर्म होकर दर्द करने लग जाता है ।

जब सिरदर्द के कारणों की बात करते है इसके कारणों में सामान्य से लेकर भयंकर कारणों की जानकारी मिलती है ।

रक्तचाप के बढ़ने और घटने से दोनों समय सिरदर्द हो सकता है।

रक्त में विषाणु और जीवाणु के इन्फेक्शन से यह लक्षण प्रकट हो जाते है ।

ज्यादा बोलने , जोर से बोलने ,क्रोध करने , चिंता करने और तेज या लगातार हंसने से भी यह रोग हो जाता है ।
नींद न आने पर यह बहुत लोगो को होते देखा जाता है ।कई बड़े रोगों के कारण भी लोगो में सिरदर्द देखने को मिलता है

जैसे :-
आंधाशीशी Migraine
प्रतिश्याय Coryza
अंनत शूल Trigeminal Neuralgia
सूर्यावर्त शूल Supar Orbital Neuralgia
शिरो भ्रम Vertigo
मस्तिष्कार्बुद Intra Cranial Tumours
मस्तिष्क विद्रधि Brain Abscess
शिरोभिघात Head Injuries

क्या कहता है आयुर्वेद ?

आयुर्वेद मतानुसार सभी ऋषियों के अलग अलग मत है ।
आचार्य चरक लिखते है कि शिरोरोग के पांच ही प्रकार है और इन्ही कारणों से यह रोग उत्पन्न होता है ।
वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, और कृमिज ।

आचार्य सुश्रुत ने 11 प्रकार बताये है और आचार्य वाग्भट्ट 10 प्रकार बताते है ।

आयुर्वेद ग्रन्थों में शारीरिक चिकित्सा में चरक संहिता का ही बड़ा नाम है सुश्रुत शल्य के लिए और वाग्भट निदान के लिए प्रसिद्द है ।

आयुर्वेद ग्रंथो में सभी शिरो रोगो के कारण निम्नानुसार बताये है ।

शिरः रोग के प्रमुख कारण :-

1 अधारणीय वेगो को रोकने से ।
2 दिन में सोने और रात में जागने से ।
3 नशीली वस्तु के सेवन से ।
4 जोर जोर से बोलने पर ।
5 औंस में सोने से ।
6 हवा के वेग के सामने आने से ।
7 अधिक मैथुन करने से ।
8 अप्रिय और उग्र गन्ध से ।
9 धुली, धुआँ, बर्फ, और धूप के आघात से ।
10 गुरू, अम्ल, हरित ( अदरक, मिर्च) , पदार्थो के सेवन ।
11 अत्यंत शीतल जल के सेवन से ।
12 शिर पर चोट लगने से
13 पूर्व भोजन के पचने से पहले दुबारा भोजन करने से
14 रोने से भी और आसुंओ को रोकने से भी ।
15 बादलो के छा जाने से ।
16 मानसिक तनाव से ।

इन उपरोक्त कारणों से शरीर में वायु प्रकुपित होकर शिरः शूल और अन्य शिरो रोगों को उत्पन्न कर देती है ।

आचार्य अग्निवेश चरक संहिता में इसका वर्णन इस प्रकार करते है ।
"वातादयः प्रकुप्यन्ति शिरस्यस्रम च कुप्यन्ति ।
ततः शिरसि जायन्ते रोगा विविध लक्षणा ।।" च.सु.

बचाव :- शिरः शूल से कैसे बचा जाए ?

शिरः शूल से बचने के लिए ऊपर कहे गए कारणों से बचना चाहिए । अपने कर्तव्यों की पालना सही समय पर करनी चाहिए ।

उपचार :-

सामान्य उपाय :-

1 रोग के मूल कारण को दूर करे ।
2 रोगी को अजीर्ण से बचाये ।
3 मलावरोध न रहे ।

विशेष उपाय :-

विशेष उपाय में सिरदर्द के मूल कारण की चिकित्सा औषधि व्यवस्था करवा कर करनी चाहिए । जिस प्रकार का रोग हो उसकी उसी प्रकार से योग्य चिकित्सक से चिकित्सा करवानी चाहिए ।

Thursday, 13 July 2017

मोटा होने की दवा (Health improve medicine)

आजकल हेल्थ बनाने का माहौल बना हुआ हैं, सभी लोग अपनी हेल्थ बनाने में लगे हुए है कोई योग कर रहा है कोई जिम में जाता है किसी को घूमने का चस्का लगा हुआ है । यह बहुत ही अच्छी बात है । अपनी सेहत का ख्याल हमेशा ही रखना चाहिए । अपनी सेहत लाख नियामत कहा जाता है ।

निरोगी रहना बहुत ही अच्छा विचार है और इनके लिए किये गए कार्य बहुत ही सही रहते है । लेकिन कुछ लोग सेहत के नाम पर सिर्फ वजन बढ़ाना ही मानते है । वे लोग यह सोचते है कि हेल्थी का मतलब मोटा तगड़ा शरीर होना ही है । और मोटे होने के लिए किसी भी प्रकार की दवा का प्रयोग कर लेते है ।आजकल बाजार में तरह तरह के पाउडर मिलते है ये पाउडर बेचने वाले तरह तरह के दावे करते है । सुन्दर और आकर्षक डिब्बो में बंद यह दवा कही भी आराम से उपलब्ध हो जाती है लेकिन यह कभी नही भुलना चाहिए कि जिस प्रकार  डिब्बा बंद खाना (जंक फूड) खतरनाक होता है  उसी प्रकार डिब्बा बन्द मोटे होने की दवा भी खतरनाक हो सकती है ।

मेरे पास काफी लोग आते है जिनको यह रहता है कि मैं बिना किसी मेहनत के अपना शरीर निरोगी बना लूँ । कोई इस प्रकार की दवा मिल जाये जिससे मेरी देह फूल जाये और मैं मोटा दिखने लगूँ ।

मैं ऐसे मरीजो को साफ मना कर सकता हूँ लेकिन नही उन्हें साफ मना करने से वे किसी और जगह पर जायेंगे और कोई न कोई उनको लूटने वाले मिल जाएंगे और उनसे धन भी ले लेंगे और शरीर का नाश भी कर देंगे ।

ऐसे मरीजो को मै बहुत प्यार से समझाता हूँ क़ि आप लोगो को यदि शरीर को मात्र फूलाना है तो आपको मेरे पास निराश ही होना पड़ेगा लेकिन यदि शरीर को फौलादी बनाना है तो मेरे पास दवा है । मेरे साथ मरीजो से लगभग इस प्रकार की बाते रोजाना होती है । मोटे होने की दवा के बारे कुछ वार्तालाप के अंश यहां भी प्रस्तुत है । पढ़ें :--

मरीज कहता है :- हमने तो सूना है कि आप शरीर फूलने की दवा देते है ?

डॉक्टर : -  आपने गलत सुना है मै तो शरीर को स्वस्थ करने तथा जो हम भोजन करते है उसका रस बने इस प्रकार की दवा देता हूँ । जब हम स्वस्थ रहते है और जो कुछ खाते है वह यदि शरीर को लग जाता है तो शरीर फूलता नही है मजबूत होकर मोटा फौलादी हो जाता है ।

मरीज बोला :- इसमें क्या अंतर है ? फूलना और मोटा होना दोनों एक ही तो बात है ।

डॉक्टर  :- अमूमन जो दवा बाजार में मिलती है वे सिर्फ भूख बढ़ाती है और ज्यादा खाने से शरीर में फुलावट आ जाती है । कई लोग तो बियर पीकर भी अपना शरीर फूला ही लेते है फिर दवा और दारू में क्या अंतर हुआ । कुछ लोग एलोपैथी की स्टोरॉइड दवा खाकर भी शरीर फुला लेते है । लेकन यह स्थिर नही रहता । यह बढा हुआ वजन कुछ दिन बाद वापिस कम हो जाता है ।

मरीज :- आप जो दवा देते है क्या उससे जो वजन बढ़ता है वह कम नही होता ??

डॉक्टर  :- जो दवा मै देता हूं यदि उस दवा का पूरा कोर्स जो की चार महीने का होता है पुरे परहेज के साथ ले लिया जाये तो फिर वजन कम ज्यादा होता रहता है लेकिन वापिस पूर्व की स्थिति में कम नही होता है ।

मरीज :- चार महीने तो बहुत ज्यादा है । इतने महीने में तो वजन बहुत बढ़ जाएगा ।

डॉक्टर  :- यह दवा वजन बढ़ाने के लिए नही है । यह बात आपको पहले भी बता चुका हूँ । इससे पाचन क्षमता बढ़ जाती है और  जो कुछ भी हम खाते है उसका रस बनता है और  उससे वजन भी बढ़ता है तो जितनी शरीर को जरूरत है लंबाई के अकॉर्डिंग वजन बढ़ता है । और यह काम जल्दी का नही है । इसलिए चार महीने दवा लेनी पड़ती है ।
आयुर्वेद ग्रंथो में बहुत सी दवा है जिससे शरीर की क्रिया सही मार्ग पर चलने लगेगी । शरीर निरोग रहेगा तो वजन और सेहत दोनों अच्छी होने लगेंगी । काम करने में मन लगने लगेगा ।

मरीज :- तब तो यह कोर्स बहुत महंगा पड़ता होगा ??

डॉक्टर :- नही । यह कोर्स बहुत महंगा नही है । वैसे भी यदि हेल्थ बनानी हो तो पैसो की तरफ नही देखना चाहिए ।क्योंकि दवा से ज्याद तो भोजन की खुराक पर खर्च होने वाले है । हा हा हा...

इस प्रकार की बाते करके बहुत लोग अपना संशय दूर करते है और मै तो कहता हूँ क़ि संशय दूर करना भी चाहिए । दवा से आज तक पूरे हिंदुस्तान करीब पांच हजार लोगो ने लाभ उठाया है । फोन पर भी लोग सलाह मशविरा करते है । ईमेल भी करते है । 17 से 50 साल तक के सभी स्त्री पुरुषों के लिए यह दवा बहुत ही कारगर साबित हो रही है ।

इस दवा के सेवन के बाद मेरे पास बहुत लोगो के धन्यवाद स्वरूप फोन आते है लोग कहते है कि हमारे अंदर अंदरूनी शक्ति का भी इजाफा हुआ है कई बहिन बेटियां जो स्वेत् प्रदर जैसे रोग से ग्रसित थी वो ठीक हुई है ।

यह दवा राजस्थान के आलावा बेंगलोर ,मुम्बई, सूरत , अहदाबाद , चैन्नई, जैसे बड़े शहरो के लोगो को भी मेरे द्वारा भेजी गई है । मैं उन सभी लोगो से निवेदन करना चाहूंगा जिन्होंने मेरे से यह ट्रीटमेंट लिया है वे लोग इस पोस्ट को पढ़े तो अपने कॉमेंट जरूर लिखे । जिससे तुम्हारे जैसे और भी कई साथी इस आयुर्वेद अमृत का फायदा उठा सके ।

Friday, 16 June 2017

योग से लाभ

योग हमारे जीवन का एक भाग होना चाहिए । योग एक ऐसी क्रिया है जिससे हम स्वस्थ तो रहते ही है साथ ही साथ सकारात्मक भी रहते है । यह योग आयुर्वेद चिकित्सा का ही एक हिस्सा है । जिस प्रकार हम नियमित रूप से आयुर्वेद को जीवन में उतार चुके है उसी प्रकार अब योग को भी जीवन में उतार लेने से हमारा जीवन सुखमय बन जाएगा ।

योग से क्या लाभ होता है ?
जब हम योग को जानने लगते है तब हमें आभास होता है कि हमारा जीवन कितना अनमोल है कितना सुन्दर है और यह प्रकृति कितनी सुन्दर है ।
यह सब आभास होते ही मन में एक सकारात्मकता आ जाती है । अतः यह कहा जा सकता है कि योग से जीवन सकारात्मक होता है । किसी भी प्रकार की कोई शिकायत जीवन में किसी के प्रति भी नही रहती है । आत्महत्या जैसे भयानक कदम उठाने से बचा जा सकता है । नियमित योग करने से जीवन सुन्दर बन जाता है ।
योग को जान लेना और फिर सभी प्रकार के आसनो का अभ्यास करने से शरीर मजबूत होता है । शारीरिक क्षमता बढ़ती है । मन प्रशन्न रहता है कार्य करने की इच्छा बढ़ जाती है । इसी प्रकार योग हमे शारीरिक रूप से मजबूत बनाता है ।
योग के आठ अंगो में एक अंग ध्यान है नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करने से शरीर की सभी क्रिया एक रूप हो जाती है एकाग्रता बढ़ जाती है जिससे बुद्धि और स्मृति की वृद्धि हो जाती है । जिन लोगो को भूलने की आदत हो या जिन लोगो को नींद नही आती हो ऐसे लोगो को यह योग अवश्य करना चाहिए । विद्यार्थियों को भी यह अभ्यास करना चाहिए ।
योग से हम धन सम्पन्न भी हो सकते है । कैसे ??
हम यदि नियमित योग करते है तो हम बीमार नही होंगे । यदि बीमार नही होंगे तो जो धन दवा के लिए खर्च होता था वह बच जायेगा । साथ ही योग से कार्य क्षमता भी बढ़ जाती है । अतः ज्यादा काम करने से ज्यादा धन आएगा । योग से स्किल डवलपमेंट भी होता है । अपने अंदर की जो कार्य कुशलता है उसका विकाश होगा उससे भी हमे धन की प्राप्ति होगी । इसलिए कह सकते है कि योग से धन सम्पन्न बना जा सकता है ।
योग करने से समाज में प्रतिष्ठा बढ़ जाती है । क्योंकि योग से चरित्र का निर्माण होता है । और चरित्रवान व्यक्ति सभी जगह पूजनीय होता है ।
योग से मोक्ष की प्राप्ति भी होती है
जीवन का लक्ष्य मोक्ष है और जब हम पूर्णतः योग से जुड़ जाते है तो सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होते जाते है और सभी प्रकार के डर भय भी समाप्त हो जाते है ।यह अवस्था ही है जो गीता में लिखे श्लोक को सार्थक करती है "निर्भयम सत्त्वं संशुद्धि" और शायद  इसी को ही मोक्ष कहते है ।

Sunday, 16 April 2017

Yoga kaise kare ? Samadhan योग कैसे करे ? समाधान भाग -3

आप लोग लगातार योग के बारे में मेरे ब्लॉग पर मेरी पोस्ट पढ़ रहे है । आप लोगों को प्रारंभ में आप लोगो की जो समस्याएं थी वह "योग कैसे करे ? समस्याएं " में मैंने बताई है उसके बाद समस्याओं का समाधान के बारे में बताया जा रहा है । बहुत ही सरल और जिसे आप और हम कर सकते है इतनी सरल तरीके से समझाया गया है । उन समस्याओं के समाधान में यम और नियम के बारे में बहुत सरल ढंग से बताया गया है । उन सभी को  आप लोग  के लिए योग के आठ अंगों में से दो अंगों की बात "योग कैसे करे ? समाधान" में बताया गया । वहां पर पढ़ सकते है । आज हम तीसरे अंग की बात करेंगे और वह अंग है "आसन" 

आप लोग जानते है कि योग के आठ अंग होते है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । आज हम तीसरा अंग आसन की बात करेंगे ।

What do mean Aasana ?  आसन क्या है ?

योग का तीसरा अंग है आसन । आसन का साधारण सा मतलब है बैठना । हम जिस किसी स्थिति में आराम से बैठ सकते है वह आसन है । शरीर को भिन्न भिन्न स्थतियों में रखते हुए जिस किसी भी एक स्थिति में आराम से बैठने के अभ्यास को आसन कहते है । या यु कहे की अपने आपको अलग अलग मुद्रा में स्थिर रखने की क्रिया ही आसन कहलाती है । यदि हम किसी आसन में आराम से नही बैठ पा रहे है लेकिन उस स्थिति में बैठने से शरीर को फायदा हो रहा है तो हम उसको अभ्यास करके अपने लिए आसान बना लेंगे । जब आसान हो जायेगा या आसान करने का अनवरत अभ्यास करेंगे उसे ही योगासन कहेंगे ।

इसकी अलग अलग मुद्रा का अलग अलग ही लाभ मिलता है इनका अलग अलग गुण होते है ये शरीर को स्वस्थ रखने के साथ ही अपने मन को भी स्वस्थ करने की क्षमता रखते है । यह योग का एक प्रमुख हिस्सा होने के कारण आजकल योग को योगासन कहा जाने लगा है ।

अब भिन्न भिन्न मुद्रा की बात करते है । इस संसार में जितने प्राणी है चाहे वे जंतु हो या वनस्पति वह सभी किसी ना किसी स्थिति में खड़े होने या बैठने की एक विशेष आकृती लिए होते है । और जिस आकृति में वे रहते है वह उसकी विशेषता के साथ साथ उसके किसी ख़ास गुण को भी बखान करती है । जैसे वृक्ष का खड़ा होना उसकी स्थिरता को इंगित करता है यदि मनुष्य वृक्षासन का अभ्यास करेगा तो निश्चित रूप से अपने जीवन में स्थिरता की वृद्धि करेगा । उसी प्रकार यदि भुजंगासन करेगा तो भुजंग यानि सर्प के समान अपनी तंत्रिका तंत्र और रीढ़ को मजबूत कर लेगा । ये सभी साधारण सी बातें है जो योग की ओर ले जाने के लिए हमको प्रेरित करती है ।

Who are eligible for yoga ?  योग करने के योग्य कौन है ?

योग करने के लिए वे सभी लोग योग्य है जो स्वास्थ्य को प्राप्त करना चाहते है । यह किसी के लिए भी लगभग निषेध नही है । कुछ जगहों पर कुछेक आसनो को निषेध बताया है लेकिन वे लोग भी सामान्य आसनो को कर सकते है । जैसे गर्भवती स्त्री को कुछ आसन निषेध है। जिनको कमर में दर्द रहता है उन लोगो के लिए कुछ आसन निषेध है । लेकिन कईं आसन है जिन्हें इस प्रकार के रोगी आसानी से करके अपने कमर दर्द को ठीक कर सकते है । ऐसे लोगो को किसी योग शिक्षक से सीख कर या उनकी देखरेख में आसन करने चाहिए ।

योगासन विद्द्यार्थी , गृहस्थी, वानप्रस्थी, संन्यासी, स्त्री , पुरुष, तथा बच्चे सभी के लिए उपयोगी है । यह आसन सभी लोगो को करने चाहिए ।

स्वस्थ रहने के लिए आहार - विहार का संयम और नियमित दिनचर्या का क्रम आवश्यक है , उतना ही यह भी आवश्यक कि शरीर के अंग सक्रिय और जीवंत रहे ।
आजकल तमाम सम्पन्न व्यक्ति जिन्हें पोषक आहार के साथ जीवन की तमाम सुविधाये उपलब्ध है, वे भी तमाम शारीरिक रोगों से पीड़ित रहते है । शरीर एक फैक्ट्री की तरह है । जिसमे तमाम तरह की क्रियाये चलती रहती है । शरीर में जहा उपयोगी तत्व बनते है । वही पर अवशिष्ट पदार्थ भी बनते है नई कोशिकाएं बनती है तो कुछ कोशिकाएं मृत भी हो जाती है । हम खाना खाते है तो रस रक्त मांस के साथ साथ मल मूत्र का भी निर्माण होता है ।यह शरीर लगातार बनता और बिगड़ता रहता है । इसलिए इसे स्वस्थ रखने के लिए आयुर्वेद के मनीषियों ने योग का विवेचन किया है और उस योग के आठ अंगों में  सबसे महत्वपूर्ण आसन को  बताया गया है ।

आसन के प्रकार

आसनो को अलग भागो में हम बाँट सकते है ।

1 बैठ कर करने वाले आसन

इन आसनो को आसानी से बैठकर किया जा सकता है जैसे :- सुखासन, पद्मासन , बद्ध पद्मासन आदि ।

2 खड़े होकर करने वाले आसन

यह आसन खड़े होकर किये जाते है जैसे :- ताड़ासन, वृक्षासन आदि ।

3 सीधे लेटकर करने वाले आसन

ये आसन जमीन पर सीधे लेटकर किये जाते है जैसे :- शवासन, चक्रासन, सेतुबंधासन आदि ।

4 उलटे लेटकर करने वाले आसन

यह आसन उलटे लेटकर किये जाते है जैसे :- नौकासन , भुजंगासन , शलभासन आदि ।

किस रोग में कौनसा आसन करे ? इसके बारे में अगली पोस्ट का इंतजार करे । जल्दी ही आपकी सेवा में मेरी अगली पोस्ट आएगी ।

निम्न लिखित दो पोस्ट को जरूर पढ़े ।

" आसन करे रोगानुसार "
" आसन :- पशु पक्षियों जैसे क्यों ? "

Friday, 31 March 2017

भोजन कैसे करे ?? How to take food ?

हमे जीवित रहने के लिए जितनी हवा और पानी की आवश्यकता है उतनी ही आवश्यकता आहार की भी है। आहार मतलब भोजन । भोजन ही है जो हमारे शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है । जिस प्रकार कोई वाहन बिना इंधन के नही चल सकता उसी प्रकार यह प्राणियों का शरीर भी बिना आहार के नही चल सकता है ।
पशुओं , पक्षियों, जानवर सभी प्रकार के जीवो को भोजन की जरुरत होती है । ये दिनभर भोजन के लिए ही मेहनत करते है । इनका काम किसी भी प्रकार से अपना पेट भरना होता है । ये सभी प्राणी बहुत ही सावधानी पूर्वक अपना आहार खोजते है और जो उचित होता है वही ग्रहण करते है । किसी किसी पशु या पक्षी को आपने भी देखा होगा क़ि कई बार वे घास या किसी अभक्ष्य आहार को सूंघ कर छोड़ देते है । मतलब यह है कि पशु पक्षी भी भोजन की पूरी प्रक्रिया को फॉलो करते है । उन्हें प्रकृति ने सिखाया है कि कोनसा आहार सही है और कौनसा आहार उनके लिए गलत है ।पशुओं के लिए कहावत भी है कि "ऊंट छोड़े आक और बकरी छोड़े ढाक"
मगर एक इंसान यानी मनुष्य ही है जो इस आहार विधि को अपनाता नही है । जो मिला जिस भी स्थिति में मिला चर लिया । कई बार तो जो खाने लायक नही था शास्त्रो में निषिध्द है उसे भी खा लेते है । दिन भर में दश  चाय बीस गुटका तीस प्रकार की चाट पकोड़ी और पचास प्रकार की शराब कोल्ड ड्रिंक पता नही क्या क्या ?
यह पेट मनुष्य को सबसे बड़ा कचरे का डिब्बा दिखाई देने लगा है ।जहा मिला खा लिया जैसा मिल गया खा लिया । सुबह का बनाया हुआ शाम को फिर से गर्म करके खा लिया । रात को बनाया उसे सुबह खा लिया । कोई भी नियम खाने के लिए नही बना रखे है । बस अपनी मर्जी से सब चल रहा है । इसीलिए आजकल तरह तरह के रोगों ने मनुष्य को घेर रखा है ।
आयुर्वेद के मनीषियों ने हजारों वर्ष पहले ही ऐसे ऐसे नियम बना दिए थे जो आज भी बहुत ही और एकदम सही भी है । यदि इन नियमो का पालन किया जाये तो कई प्रकार के रोगों से तो ऐसे ही मुक्ति मिल सकती है । हम आज इस लेख में यह चर्चा करेंगे क़ि :- भोजन कैसे करे ? How to take meal ?
आहार सम्बन्धी विचार ( Thoughts about Diet ):- 
1. मात्रा निर्धारण :-  सबसे पहले भोजन की मात्रा का निर्धारण करना चाहिए ।  हमें यह जानकारी कैसे हो ? इसके लिए कहा गया है कि आहार की मात्रा "बलापेक्षिणी" अर्थात बल के अनुसार मात्रा का निर्धारण किया जाता है । प्रकृति ने हमें अपने खुद की भूख की क्षमता का ज्ञान करने योग्यता दी है । हमे पता चलता है कि हमे कितनी भूख है मेरी जठराग्नि कितना भोजन पचाने में समर्थ है । इस क्षमता ( Digestive capacity )का  आभास लगभग सभी को होता है । अतः सबसे पहले मात्रा का निर्धारण करना चाहिए । और फिर मात्रानुसार भोजन करे ।
2. गुरू और लघु आहार का निर्धारण :- मात्रा के बाद लिखा हैं कि मात्रा निर्धारण करते समय अग्निबल Digestive capacity के साथ साथ  आहार द्रव्यो का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि आयुर्वेद के मनीषियों ने लिखा है :-  'गुरूणाम आर्धसोहित्यम लघुनां तृप्तिरिष्यते' अर्थात गुरू (तेल , घी में पके हुए पदार्थ अथवा वे पदार्थ जो जल्दी नही पचते ) पदार्थो के भोजन से आधी तृप्ति का होना ही पूर्ण भोजन समझे और लघु (जल्दी पचने वाले ) पदार्थो को तृप्ति से अधिक सेवन ना करे ।
3. आहार विधि :- आहार को कैसे ग्रहण करे ? कौनसा भोजन रोजाना कर सकते है और कौनसा भोजन सप्ताह में एक बार करे । किस प्रकार व्यवस्था हो ,इसके लिए चरक संहिता में आठ प्रकार की विधि बताई गई है :-
1.प्रकृति(Natural form)
2.करण(Preparation)
3.संयोग(Combination)
4.राशी(Quantity)
5.देश(Haleitat)
6.काल (Time)
7.उपयोग संस्था(Direction of use)
8.उपयोक्ता (User)
यह बहुत ही विस्तृत विषय है इस पर हम चर्चा करते रहेंगे । इस अष्ट विधि का संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है ।
अपनी प्रकृति के अनुसार तथा आहार की प्रकृति को देख कर भोजन करना चाहिए । जैसे वात प्रकृति के लोगो को वायुकारक पदार्थो को नही खाना चाहिए । पित्त वालो को गर्म अर्थात पित्त कारक आहार से दूर रहना चाहिए ।
करन मतलब भोजन बनने की प्रक्रिया , भोजन को बहुत शांत और सात्विक मन से बना कर ही खाये । यदि यह संभव ना हो तो जल हाथ में लेकर मन में अपने इष्ट देव को याद करके भोजन को सात्विक मन से खाना चाहिये।
संयोग का भी ध्यान रखे , विपरीत प्रकृति के आहार को साथ में नही खाना चाहिए जैसे :- दही और खीर , दूध और लहशन, आचार के साथ दूध , यह सब कभी भी नहीं खाने चाहिए ।
मात्रा से अधिक भोजन अजीर्ण को उत्पन्न करता है , मात्रा से कम कृशताकारक होता है ।
पचने पर ही भोजन करना चाहिए अन्यथा उसका भी समुचित पाचन नही हो पाता है ।
इच्छित यानि इष्ट स्थान पर ही भोजन करे , प्राचीन परंपरा के अनुसार रसोई घर ही इष्ट जगह मानी जाती है अतः जहाँ तक हो सके तो अपने घर पर ही भोजन करना चाहिए ।
जल्दी जल्दी भोजन नही करना चाहिए , तथा ना ही धीरे धीरे भोजन करना चाहिए क्योकि ये दोनों प्रकार एक प्रकार की आदत को इंगित करते है ।आराम से बैठ कर सरल तरीके से आनंद के साथ भोजन करने से लाभ मिलता है
भोजन करते समय में यह ध्यान रखना चाहिए क़ि कम से कम बात करे । धर्म शास्त्रों में भोजन करते समय मौन रहने का बड़ा ही महत्त्व बताया गया है ।
और अंत में पुनः एक बार यह यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि जितनी पाचन शक्ति है और जितना हम आराम से पचा सकते है उतना ही भोजन करना चाहिए
। माधव जी ने लिखा है :-
अनात्मवन्तः पशुवद भुंजन्ते ये नराधमाः ।
रोगानिकस्य ते मूलजीर्णे प्राप्नुवन्ति हि ।। माधव निदान

Friday, 10 March 2017

चर्म रोग (Skin disease) में आयुर्वेदिक दवा :-

विभिन्न प्रकार के अशुद्ध या विरोधी आहार विहार के कारण शरीर में जब वात पित्त और कफ की वृद्धि हो जाती है और वह बढे हुये त्रिदोष त्वचा, रक्त , मांस,  तथा लसिका को दूषित कर देते है जिससे विभिन्न प्रकार के चर्म रोग होने लगते है ।

आयुर्वेद ग्रंथों में चर्म रोगों को कुष्ठ रोगों में गिना गया है ।ये चर्म रोग जिन्हें कुष्ठ कहा गया है ये  अठारह प्रकार के बताये है ।
इनका भी विभाजन किया गया है 1.महाकुष्ट 2. क्षुद्र कुष्ठ ।

महाकुष्ठ सात होते है जबकि क्षुद्र कुष्ठ ग्यारह प्रकार के बताए गए है । आयुर्वेद एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है जिसमे सभी रोगों का विस्तार से वर्णन किया गया है ।

महाकुष्ठ :- सात है

1. कपाल
2.उदुम्बर
3.मंडल
4.ऋष्य जीभ
5.पुण्डरीक
6.सिध्म
7.काकनक

क्षुद्र कुष्ठ :- ग्यारह होते है ।

1. एक कुष्ठ
2. चर्म कुष्ठ
3 किटीभ
4 विपादिका
5 अलसक
6 दद्रु
7 चर्म दल
8 पामा
9 विस्फोटक
10 शतारु
11 विचर्चिका

जिस प्रकार चर्म रोगों का वर्णन किया गया है उसी प्रकार औषधियों की भी विस्तृत चर्चा की गई है । अब मुख्य रूप से सही योजक (चिकित्सक ) हो तो आयुर्वेद चिकित्सा से भी बहुत लोगो को लाभांवित किया जा सकता है । कुछ औषधियों का जिक्र यहाँ किया जा रहा है । इनको सामान्य रूप में काम में लिया जा सकता है ।

चिकित्सा (Treatment)

चर्म रोगों की सामान्य चिकित्सा में :-

वात दोष प्रधान चर्म रोग :- घृत पान
पित्त दोष प्रधान चर्म रोग :- वमन
कफ दोष प्रधान चर्म रोग में :- रक्त मोक्षण, विरेचन ।

औषदिय चिकित्सा :-

महातिक्त घृत
खदिरारिष्ट
गंधक रसायन
मदयंत्यादि चूर्ण
सरिवादी हिम
महामंझिष्ठादि कषाय
तुवरक तैल
बाकुची योग
रसादि लेप
गुलाबी मलहम
जीवंत्यादि मलहम
उपरोक्त दवाइयां बाजार में उपलब्ध है । इनके अलावा भी बहुत सी दवा है जिन्हें चिकित्सक अपने विवेक से तैयार करके काम में ले सकते है ।

अपने जीवन में आयुर्वेद को अपनाए । जीवन सुखमय भी होगा और जीने का आनंद भी आयेगा ।

डॉ वेदप्रकाश कौशिक
आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर राजस्थान

Tuesday, 7 March 2017

इन्द्रायण(Indrayan/Bitter Apple Herb) :- गर्भ धारण में उपयोगी

प्रजास्थापन महा कषाय (procreants) का एक औषध द्रव्य है इन्द्रायण । इसे ऐंद्री, इंद्र वारुणी, और इन्द्रायण के नाम से जाना जाता है।
परिचयः

रस- तिक्त,
गुण - गुरू, स्निग्ध, सर ।
वीर्य- उष्ण, विपाक- कटु,
प्रभाव- रेचक,
और दोष कर्म - कफ नाशक होता ।
इसकी पोटेंसी एक वर्ष बताई गई है ।

यह औषधि सूत्र प्रतानी के रूप में प्रायः राजस्थान , बंगाल, बिहार, की रेतीली भूमि में पाई जाती है ।

इसके पत्र एकांतर होते है ।
पुष्प पीत और घटाकार (मटके के आकार के) होते है । फल- पीत(पीले रंग के )
और  बीज अंडाकार धूसर होते है ।
उपयोग:-

स्त्रियों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण औषधि है । स्त्रियों में यह बल बढाने में बहुत ही उपयोगी है जिन महिलाओं में गर्भ धारण की क्षमता कम होती है उनमें यह गर्भाशय की कार्य क्षमता को बढ़ा कर गर्भाशय को मजबूत कर गर्भ धारण के योग्य बनाती है इसे महिलाओं में वाजीकरण बढाने वाली अषधि के रूप में जाना जाता है।

जिन महिलाओं में समय से पहले आर्तव (mentruretion) आना बंद हो जाता है या बहुत ही कम मात्रा में आता है उस अवस्था में यह औषधि कारगर सिद्ध होती है इसलिए इसके बारे में लिखा है कि यह नष्ट आर्तव में बहुत ही उपयोगी है ।
 
अन्य रोगों में भी यह कार्य करती है जैसे असमय में बालो के सफेद होने पर इसके बीजों से तैयार किया हुआ तैल से अभ्यंग (बालो को तेल में भिगोना अभ्यंग कहलाता है ) करने से बाल असमय में सफेद नही होते है ।
इन्द्रायण की जड़ के लेप को शौथ, विद्रधि, उपस्तम्भ  में लेते है । यह कमला और प्लीहोदर रोग को भी ठीक करता है ।

इन्द्रायण का विशेष रूप से स्त्रियो के गर्भ धारण की क्षमता बढाने में निम्न लिखित प्रकार से उपयोग किया जाता है ।

बेल पत्र के पत्तो के साथ इन्द्रायण की जड़ को पीस कर 10-20 ग्राम की मात्रा में नियमित प्रातः काल और सायंकाल स्त्री मरीज को पिलाने से वह गर्भ धारण करने में सक्षम हो जाती है ।

गर्भ धारण के बाद कभी कभी गर्भ अपने स्थान से नीचे की ओर चला जाता है उस समय भी इसकी जड़ो को पीसकर प्रसूता स्त्री के बढ़े हुए पेट पर लेप करने से पेट अपनी जगह पर आ जाता है ।

इसके मुख्य योग जो बाजार में मिलते है :-

1 नारायण चूर्ण
2 सुख विरेचनी वटी

डॉ वेदप्रकाश कौशिक
आयुर्वेद मेडिकल ऑफिसर राजस्थान